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राष्ट्रवाद पर आज मान-सम्मान

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:4 May 2019 5:32 PM GMT
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सत्ता सुख भोगने के स्वार्थ में हमारे देश में राजनीतिक स्तर इतना नीचे गिरता जा रहा है जिसकी मात्र एक दशक पूर्व तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। राजनीति के क्षेत्र में आज मान-सम्मान, राजनीतिक पतिबद्धताएं, राजनीतिक वादे, जनसरोकार, राष्ट्रहित, राष्ट्रीय एकता व अखंडता, देश का बहुमुखी विकास जैसी सबसे महत्वपूर्ण बातें तो बहुत पीछे चली गई हैं। आज इनके स्थान पर सांपदायिकता, धर्म व जाति की राजनीति, असहमति रखने वालों के मुंह पर कालिख पोतने का चलन, अपने वरिष्ठ नेताओं व गुरुओं का तिरस्कार, भ्रष्टाचार यहां तक कि अपने विरोधियों या आलोचकों को सैन्य विरोधी, राष्ट्रविरोधी या राष्ट्रद्रोही का पमाण पत्र दे देना जैसी बातें सुनाई दे रही हैं। नए-नए शब्द अपने विरोधियों के लिए गढ़े जा रहे हैं। निठल्ले एवं नाकारा किस्म के वे राजनीतिज्ञ जो सत्ता में रहते हुए अपने लोकलुभावन वादे पूरे कर पाने में असमर्थ रहे वे लोग अब जनता के मध्य अपनी बेचारगी,अपने धर्म के नाम पर तथा पाचीन संस्कृति व सभ्यता में वापस ले जाने जैसी गैर-जरूरी बातें कर जनता को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। इसी सिलसिले में अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की बात भी की जाती है, उन्हें सेना विरोधी बता दिया जाता है। कभी जेहादी कभी अरबन नक्सल तो कभी आतंकवाद का सरपरस्त गोया जो भी मुंह में आए वह बोल दिया जाता है। पिछले दिनों विपक्ष पर लगाए जा रहे इसी पकार के बेतुके व तथ्यहीन आरोपों के बीच भारतीय जनता पार्टी के लौहपुरुष समझे जाने वाले वरिष्ठतम पार्टी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी राजनैकि उपेक्षा के काफी लंबे अरसे के बाद एक ब्लॉग लिख कर अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया। अपने बहुचर्चित ब्लॉग में आडवाणी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र का सार उसकी विविधिता और अभिव्यक्ति की आजादी है। अपने जन्म के बाद से ही भाजपा ने खुद से राजनीतिक तौर पर असहमति रखने वालों को कभी `दुश्मन' नहीं माना बल्कि उन्हें हमसे अलग विचार वाला माना है।

-महेश चौहान,

रोहिणी, दिल्ली।

राजनीति में बढ़ता आलोचनाओं का दौर

इसी तरह भारतीय राष्ट्रवाद की हमारी अवधारणा में हमने राजनीतिक तौर पर असहमत होने वालों को कभी `देश विरोधी' नहीं माना। उन्होंने यह भी लिखा कि पार्टी के भीतर और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य दोनों में ही लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा भाजपा की गौरवपूर्ण पहचान रही है। इस ब्लॉग में आडवाणी ने वर्तमान राजनीतिज्ञों को आईना दिखाने वाली और भी कई महत्वपूर्ण बातें लिखी हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि अपने जीवन में सैद्धांतिक रूप से उन्होंने हमेशा सबसे पहले देश उसके बाद पार्टी तथा अंत में खुद को माना है। आडवाणी के उपरोक्त ब्लॉग से इस समय उन्हीं की अपनी पार्टी के नेताओं खासतौर पर पधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सीख लेने की जरूरत है। भाजपा के वर्तमान शीर्ष नेता अपने `मार्गदर्शकों' के विचारों का कितना आदर, पालन व सम्मान कर रहे हैं यह इस समय पूरा देश देख रहा है। आडवाणी के ब्लॉग में व्यक्त विचारों के ठीक विपरीत इस समय पहले व्यक्ति को समझा जा रहा है और देश की एकता, अखंडता तथा समृद्धि आदि तीसरे व चौथे नंबर पर चली गई हैं। आज पूरे देश में घूम-घूमकर जनसभाओं में यही बताया जा रहा है कि विपक्षी दल मोदी का विरोध कर पाकिस्तान के लोगों को खुश कर रहे हैं। यदि कोई बुद्धिजीवी सत्ता से सवाल करता है और उसे पांच वर्ष पूर्व किए गए वादों की याद दिलाता है तो उसे या तो अर्बन नक्सल बता दिया जाता है या पाक परस्त या आतंकवादियों का हमदर्द जैसे किसी भी विशेषण से नवाज दिया जाता है। हद तो यह हो गई है कि हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करने वाली भारतीय सेना के भी सांपदायीकरण व राजनीतिकरण की कोशिश की जा रही है। पिछले दिनों एक अजीब-सी घटना घटी जबकि उत्तर पदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारतीय सेना को `मोदी की सेना' कहकर संबोधित किया तो उसी दिन केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री जनरल विकम सिंह ने इस पर यह पतिकिया दी कि इस पकार की बातें करने वाले लोग राष्ट्रद्रोही हैं। गोया एक ही पार्टी में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे दो लोगों के परस्पर विरोधी विचार। गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजियों के मध्य इस समय देश की जनता को उलझा कर रख दिया गया है। विपक्षी नेताओं की तो बातें ही क्या करनी स्वयं भारतीय जनता पार्टी के अपने नेता रहे यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी व शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोगों ने जब-जब सरकार की नीतियों व योजनाओं पर सवाल उठाया या उसकी आलोचना की तो उनकी आवाज भी यही कहकर दबाने की कोशिश की गई।

-अजय कुमार,

कड़कड़डूमा, दिल्ली।

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