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आफत का दूसरा नाम है कार

👤 | Updated on:13 May 2010 1:40 AM GMT
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वैसे तो यह सभी शहरों की कहानी हैऋ लेकिन बड़े शहरों की यह कहानी खासतौर से है जहां कार किसी सुविध का नाम नहीं बल्कि आपफत का दूसरा नाम बन गई है। दिल्ली हो या मुम्बई, जयपुर हो या कानपुर, कोच्चि हो या कोलकाता। इन और इन्हीं की तरह तमाम दूसरे छोटे-बड़े शहर अगर आज ट्रैपिफक जाम की समस्या से रूबरू हैं तो उसका कारण सिपर्फ और सिपर्फ यही कारें हैं। समस्या सिपर्फ अपने देश के शहरों तक सीमित नहीं है। यह समस्या वैश्विक है तभी तो लंदन में पाइवेट कारों पर कंजेशन टैक्स लगा दिया गया है। लंदन में सरकार, लोगों को कार खरीदने से हतोत्साहित करती है। यही कारण है कि लंदन के उपनगरों में रहने को लोग लंदन के मुकाबले ज्यादा तरजीह देते हैं ताकि उन्हें कारों के लिए टैक्स न देना पड़े। लंदन में लोग कार से सपफर करने के पहले दो बार सोचते हैं। "ाrक यही हाल दिल्ली में है। लोग कार से कहीं जाने के नाम पर कांप जाते हैं। क्येंकि हर तरपफ जाम ही जाम मिलता है। यह अकारण नहीं है कि दिल्ली में मेट्रो को जबरदस्त कामयाबी मिली है। लोग कार से सपफर करके जाम में पफंसना नहीं चाहते। यही हाल लंदन में है। एक तो जाम की समस्या उफपर से ईंध्न द्वारा अर्थव्यवस्था का गड़बड़ता ढांचा। कुल मिलाकर कारें नए किस्म के संकट की जननी हैं। लंदन में ईंध्न से बिगड़ती आर्थिक स्थिति इस कदर चिंता का विषय है कि जो सरकार सामान्य जीवाश्म ईंध्न वाली कार के लिए लोगों को हतोत्साहित करती है, वहीं सरकार इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कारों को पोत्साहित करना नहीं भूलती। हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों को तमाम तरह के टैक्सों से मुक्त रखा गया है। अमरीका में भी हाल पार्किंग को लेकर वैसा ही है जैसा दिल्ली और मुम्बई में है। लोग दिल्ली और मुम्बई में कहीं जाने के नाम पर पहले रास्ते में मिलने वाले जाम से और पिफर न मिलने वाली पार्किंग से घबराते हैं। इसी वजह से लोग कार की बजाय सार्वजनिक वाहन को तरजीह देते हैंऋ लेकिन कुछ सामाजिक तो कुछ व्यवहारिक दिक्कतें ऐसी हैं कि कम से कम भारतीय शहरों में सार्वजनिक परिवहन पणाली लोकपिय नहीं हो रही। दिल्ली में डीटीसी की बसें अकसर "tंस-"tंस कर भरी होती हैं। उनसे सपफर करने में लोग बचते हैं अगर कोई भी दूसरा विकल्प मौजूद हो। इसलिए अपर मिडिल क्लास बसों से चलने से बचता है। कारोबारी और पोपफेशनल भी बसों में चलने से बचते हैं। क्योंकि बस का सपफर शारीरिक और मानसिक तनाव देता है। यही सोचकर दिल्ली में मेट्रो को लाया गया थाऋ लेकिन जिस तरह से मेट्रो में भी भीड़ बढ़ी है, उससे धीरे-धीरे मेट्रो भी कम से कम एक अर्थ में तो आरामदेह नहीं ही रही- भीड़ के मामले में। इसमें भी जबरदस्त भीड़ होती है खासकर दफ्रतरों के लिए जाने और दफ्रतरों से लौटने के समय में। अकेले दिल्ली में ही नहीं हिन्दुस्तान के सभी शहरों में सार्वजनिक यातायात पणाली का यही हाल है। यही कारण है कि तमाम योजनाओं, घोषणाओं और सार्वजनिक वाहनों की बढ़ोत्तरी के बावजूद शहरों की सड़कों में कारों का कापिफला बढ़ता ही जा रहा है। दिल्ली में तो यह स्थिति पागलपन की सीमा तक बढ़ चुकी है। दिल्ली में अकेले इतनी कारें हैं जितनी आध्s पश्चिमी यूरोप में है। दिल्ली में पुणे, हैदराबाद, बंग्लुरु, चंडीगढ़, चेन्नै, कोलकाता और मुम्बई की साझी कारों के से भी ज्यादा हैं। दिल्ली में कारों का लगता है लोगों में पागलपन सवार है। यही कारण है कि देश में सबसे बेहतर सड़क औसत होने के बावजूद दिल्ली में कारों की औसत रफ्रतार 20 कि.मी. और व्यस्त समय में महज 7 कि.मी. पतिघंटा है। लेकिन दिल्ली में कारों को लेकर तारी यह पागलपन न पहला है और शायद अंतिम भी नहीं। क्योंकि इस तरह का पागलपन दुनिया के और भी कई शहरों में व्याप्त है। 1950 में जहां पूरी दुनिया के शहरी लाइपफस्टाइल में पर्सनल कार एक खास तरह की आजादी और स्टेटस का पतीक थी, वहीं आज उसी के उलट कम से कम यूरोप और अमरीका में तो नरक, पदूषण और समस्याआंs का कार पतीक बन चुकी है। अगर इन सारी समस्याआंs को एक साथ कहना हो तो कह सकते हैं- कार, शहरी जीवनशैली के लिए आपफत बन चुकी है। शहरों में लगने वाला अंतहीन जाम का जरिया कारें ही हैं। यह पदूषण का घर हैं और ज्यादा से ज्यादा सड़क दुर्घअनाओं का कारण भी। दिल्ली में हर दिन लगभग एक हजार वाहन शहर के यातायात का हिस्सा बन जाते हैं। इसमें बड़ी तादाद कारों की होती हैं क्योंकि यहां कार गर्व का विषय है। कुछ लोगों को लगता है कार हमारी पगति का सूचक है। इसलिए बिना इस बात पर ध्यान दिए कि हमारे शहर की सड़कों की क्या बुरी हालत है, पार्किंग   की क्या स्थिति है कार खरीद   लेते हैं। दिल्ली में कारों की संख्या हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती    जा रही है। कारों ने किस तरह अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है इसका अंदाजा सिपर्फ बढ़ते तेल आयात बिल से ही नहीं लगता बल्कि बड़े पैमाने पर सड़कों के रखरखाव, नई सड़कों के निर्माण के लिए भी भारी मात्राा में ध्न की आवश्यकता, आदि से चलता है। बंग्लुरु अर्बन ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के एक अनुमान के मुताबिक 30,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा ध्न की जरूरत सड़कों के उन्नतिकरण, फ्रलाइओवर के निर्माण और नए ऱेट कारिडोर के निर्माण हेतु चाहिए। यही हाल मुम्बई का है। मुम्बई को संघाई बनाना है तो 50,000 करोड़ रुपये इसके इंऱास्ट्रक्चरल मेकओवर के लिए चाहिए जिसमें बड़ा हिस्सा सड़कों की उन्नतिकरण, नई सड़कों और फ्रलाईओवर के निर्माण व पहले से मौजूद सड़कों के दोनों तरपफ के एनक्रोचमेंट को दूर करने के लिए चाहिए। छोटे से लेकर बड़े शहरों तक में दिन पर दिन बढ़ता कारों का कारवां सिपर्फ दूसरे कार वालों के लिए ही परेशानी का सबब नहीं है। यह पैदल चलने वालों के   लिए भी एक बड़ा सिरदर्द है। कारों की बढ़ती संख्या न सिपर्फ पैदल चलने वालों की जिंदगी को जोखिम में डालती हैं बल्कि संविधन की उस अंतर्ध्वनि को भी बेमतलब बनाती है जिसमें हिंदुस्तान के सभी नागरिकों को संविधन की नजर में बराबर माना गया है। कारें या दूसरे वाहनों का कापिफला बड़े शहरों में आम लोगों को सड़कों के मामले में गैर बराबरी की तरपफ ध्केलती हैं। नगर नियोजक इस बात को भलीभांति जानते हैं कि शहर के हर कोनों को सब वे, बसों साइकिल, रिक्शों और पैदल चलने वालों के लिए पफुटपाथ से भलीभांति जोड़ा जा सकता है। इससे यात्रायों को यात्राा करना कम कष्टदायक होगा साथ ही ड्राइवरों को वाहन चलाते समय हरदम अपनी जान हथेली पर लेकर नहीं चलना पड़ेगा। इसके लिए शुरूआत कारों के पति बढ़ते पागलपन पर रोक लगाकर करनी होगी। क्योंकि कारें शहरी जीवनशैली के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई हैं। निनाद गौतम  

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