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किशोर होते बच्चे

👤 | Updated on:13 May 2010 1:43 AM GMT
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किशोरावस्था में बच्चों में शारीरिक मानसिक परिवर्तन आने लगते हैं। अकसर उनके माता पिता उन्हें बार बार नसीहतें देते हैं, रोकते-टोकते हैं हर वक्त पढ़ने की सीख देते हैं। खेलने, पफोन करने, टीवी देखने, इंटरनेट सपिर्फंग सब पर पाबंदी लगाने की कोशिश करते हैं। पफेंड्स को लेकर तो उनकी कड़ी हिदायत होती है कि वे उन्हें के साथ संबंध् बनाएं जिनके साथ माता-पिता उन्हें इजाजत दें। किशोरावस्था क्या आई सब दुश्मन हो जाते हैं। हारमोन्स और शारीरिक परिवर्तनों के दौर से गुजर रहे बच्चों के मन में सेक्स को लेकर ढेरों सवाल होते हैं, और दूसरी ओर उनके माता पिता हैं, जिनके अनुशासन और हिदायतों का शिकंजा और ज्यादा कसता जाता है। अगर आपके बच्चे किशोरावस्था में हैं तो वे शारीरिक और मानसिक सामंजस्य कैसे स्थापित कैसे करें यह बच्चों के लिए ही नहीं आपके लिए भी एक बड़ा सवाल होता है। अपनी बड़ी होती बेटी के शरीर में आ रहे परिवर्तनों के विषय में उसे समझाएं। उसके विषय में उसे विस्तार से बताएं। उसे वक्त पर सही नापकी ब्रा लाकर दें। आमतौर पर 12-13 साल की लड़की को माहवारी आना शुरू हो जाती है। इसके लिए लड़की को पहले से ही मानसिक रूप से तैयार कर देना चाहिए। माहवारी आने पर उसे सेनेटरी नैपकिन लाकर दें। इन दिनों में उसे शारीरिक स्वच्छता का पूरा ख्याल रखने के लिए समझाएं। किशोरावस्था में लड़कों के शारीरिक हारमोन्स में परिवर्तन आने लगता हैं जिसकी वजह से उन्हें गुस्सा ज्यादा आता है और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है। थोड़े समय बाद दाढ़ी-मूंछ आना शुरू हो जाती है। और आवाज में भी भारीपन आ जाता है जो कुछ समय बाद सही हो जाता है। जिसका दूसरे बच्चे मजाक उड़ाते हैं। लड़कों को उनके शरीर में होने वाले इन परिवर्तनों के विषय में बताएं। इस उम्र में अकसर बच्चे अपनी सेहत और सापफ-सपफाई की ओर से लापरवाह हो जाते हैं। उन्हें अपनी शारीरिक सपफाई का ध्यान रखने के लिए समझाएं। अपनी बेटी को सेक्स के बारे में बताएं उसे समझाएं कि माहवारी के बाद जरा सी असावधनी से लड़की गर्भवती हो सकती है। उसे वर्जनिटी का महत्व समझाएं और इस उम्र में सेक्स की ओर उसका झुकाव एक स्वाभाविक पक्रिया है। लेकिन उसे यह समझाएं कि उसकी यह उम्र सेक्स के अनुभव के लिए नहीं है। विवाह पूर्व सेक्स सम्बंध् हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं है। अपनी किशोरावस्था की बेटी को बताएं कि अगर कोई पफुसलाकर प्यार करने के बहाने से उन्हें छूता है तो वह इस पर अपनी तीखी पतिक्रिया करें। यदि आप उसे जूडो कराटे में पशिक्षित करा सकें तो कराएं जिससे वह अपनी शारीरिक सुरक्षा कर सके। किशोरावस्था में बच्चों के मन में अनेक सवाल होते हैं। घर में टीवी और इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जिनसे वह जो चाहे सूचनाएं मिनटों में हासिल कर सकते हैं। अकसर लड़के-लड़कियां इंटरनेट पर घंटों चैटिंग करते हैं। लड़के पोर्न साइट्स देखते हैं। यदि आप उन्हें ऐसा करते देखते हैं तो उन्हें प्यार से समझाएं और बताएं कि उनकी उम्र अच्छी शिक्षा हासिल करके कॅरिअर बनाने की है। इन बातों की ओर से वह अपना ध्यान हटाएं। इस उम्र में बच्चों का पढ़ाई में ध्यान कम लगता है। छोटी-छोटी बात पर गुस्सा होना, हाइपर एक्टिव होना, डिपेशन, ज्यादा सोचना इस तरह की समस्याएं होती हैं। गुस्से में वह अपने आप पर नियंत्राण नहीं रख पाते यदि उनका व्यवहार नियंत्राण से बाहर हो जाए तो मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग जरूरी हो जाती है। उनके असमान्य व्यवहार को यदि गम्भीरता से लिया जाए और शांति से हल निकाला जाए तो वह शांत और एकाग्रचित हो जाते हैं। अकसर बच्चे माता-पिता की बात नहीं सुनते, उनकी नसीहत उन्हें बुरी लगती है और अगर माता-पिता समझदारी से काम न लें तो बच्चे और उनके बीच संवादहीनता हो तो वे पलटकर जवाब देने लगते हैं। अकसर ऐसे माता-पिता बच्चों की बात नहीं सुनते जिसके कारण बच्चे भी माता-पिता की बात सुनने से इंकार कर देते हैं। इसलिए बच्चों के साथ बातचीत करें। उनकी समस्याओं को सुनें, उनके दोस्त बन जाएं और उन्हें इस उलझन भरी उम्र में अच्छे ढंग से विकास करने का मौका दें। किशोर उम्र के बच्चों की सबसे बड़ी समस्या है उनकी पहचान का संकट। अगर माता-पिता उन्हें हर समय टोकते हैं तो उन्हें लगता है कि उन्हें जबरदस्ती नियंत्रात करने की कोशिश की जा रही है। सीख, हिदायतें उन्हें पसंद नहीं आतीं। अपने और बच्चों के बीच में थोड़ी दूरी बनाकर रखें। बच्चों की हर छोटी-छोटी बात की जासूसी न करें। पफोन पर यदि वह आपको देखकर अचानक चुप हो जाता है तो समझ जाएं कि उसे पाइवेसी चाहिए। उसकी पाइवेसी की कद करें। यदि वह अपने लिए जिन अलग चीजों की मांग करता है उन्हें पूरा करने का पयास करें। बच्चे का मानसिक संबल बनें। उनके साथ कलह न करें तो बच्चे प्यार से धीरे-धीरे आपकी समस्याओं को समझने का पयास करेंगे। इस उम्र में बच्चे शारीरिक, मानसिक और हारमोनल परिवर्तन के दौर से गुजर रहे होते हैं। उनका मूड तेजी से बदलता है। किसी के दुख से वो परेशान हो उ"ते है और किसी भी सीमा तक उनकी मदद करने को तैयार रहते हैं। कुछ बच्चे बहिर्मुखी हो जाते हैं तो कुछ अंतर्मुखी हो जाते हैं।   भावनात्मक परिवर्तन के इस दौर में उनका मार्गदर्शन करें। किशोर होती बेटी को विपरीत लिंग के दोस्तों से सम्बंधें की सीमाओं को बताएं। उसे समझाएं कि उसकी दोस्ती का उसके जीवन पर नकारात्मक पभाव न पड़े। उसे दोस्तों की पहचान करना सिखाएं। उसे बात-बात पर टोकने के नतीजे उल्टे भी हो सकते हैं। उसका ध्यान रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़ें, उसके दोस्त बन जाएं और उसे सही सलाह दें। इस उम्र में बच्चे एक दूसरे के पति जल्दी आकर्षित हो जाते हैं। इस उम्र में आकर्षण होना स्वभाविक है जो समय के साथ धरे-धरे कम हो जाता है। अगर मामला भावनात्मक जुड़ाव का हो तो पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता जिसका बच्चे की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है। बच्चे को इन तमाम सच्चाइयों से प्यार से रूबरू कराएंं।  नीलम अरोड़ा  

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