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जहां की दीवारें सुनाती हैं जंग-ए-आजादी की कहानियां

👤 | Updated on:13 May 2010 1:47 AM GMT
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जब `बुकवाला' डिस्ट्रीब्यूटर के आशीष गर्ग ने बात जल्दी से समेटने के लिहाज से कहा, `भाई साहब मैं दो घंटे बाद आप से मिल पाउफंगा तब तक आप आनन्द भवन क्यों नहीं घूम आते', तो मुझे वाकई झुंझलाहट हुई। `आपको लगता है मैं कोई पहली बार इलाहाबाद आाया हूं?' दिल में तो  आया कि यह कह दूंऋ लेकिन कहा नहीं, आखिर बिजनेस के सिलसिले में मीटिंग जो थी। वाकई मार्च 2010 के अपने इस इलाहाबाद आगमन के पहले मैं करीब 2 दर्जन बार तो इलाहाबाद आया ही होउफंगा। जिस राजनीतिक पत्राका `माया' का मैं दिल्ली स्थित सीनियर पॉलिटिकल करेस्पोंडेंट था, उसका मुख्यालय इसी इलाहाबाद के मुट्"ाrगंज में था। लगभग 7 साल की नौकरी के दौरान कई बार इलाहाबाद आना हुआ था और हर बार इलाहाबाद घूमने की औपचारिकतावश आनंद भवन जाना जरूर हुआ था। पिफर लगभग 5 साल तक छोटे भाई ने इलाहाबाद में पढ़ाई की और पिफर सिविल सर्विसेज की यहीं तैयारी करने लगा तो उसने मिलने-जुलने के क्रम में भी इलाहाबाद आता रहा। भाई पुराना कटरा में रहता था। मैं जब भी भाई के पास इलाहाबाद जाता तो अकसर हम लोग सुबह का नाश्ता कटरा चौराहे पर स्थित `नेतराम' में करते। नेतराम पुराना कटरा चौराहे पर अब भी स्थिति उस रेस्टारेरेंट का नाम है। जहां की देशी घी की कचौरियां पूरे इलाहाबाद शहर में मशहूर हैं। यहां हमेशा लोग सीटों के खाली होने के इंतजार में खड़े मिल जायेंगे। इनमें सबसे ज्यादा संख्या छात्रााsं की होती है। इलाहाबाद बाहरी छात्रााsं का गढ़ है। शहर की तकरीबन 20 लाख की आबादी में 3 से 4 लाख बाहरी छात्रा हैं। इनमें अध्कांश बिहार और पूर्वी उत्तर पदेश के हैं। लेकिन देश के अन्य पांतों, हिस्सों के भी छात्रा हैं। इलाहाबाद की अर्थव्यवस्था के एक बड़े आधर यहां पढ़ने वाले बाहरी छात्रा और धर्मिक पर्यटक हैं जो पवित्रा संगम में डुबकी लगाने और पुरखों का तर्पण करने की चाहत में आते हैं। इलाहाबाद इन बाहरी छात्रााsं और धर्मिक हिन्दू पर्यटकों के चलते कापफी खुशहाल शहर है। खाने पीने की हजारों दुकाने हैं जो हमेशा खूब चलती हैं। इसी तरह से रहने के लिए छोटे-बड़े होटलों से लेकर सैंकड़ों र्ध्मशालाएं व सराय हैं। जब मैं भाई के साथ नेतराम की कचौरियां खाने जाता तो खाने के बाद वह तो अकसर वापस कमरे चला जाता क्योंकि उसे पढ़ना होता थाऋ लेकिन मैं वहीं से लगती यूनिवर्सिटी रोड की तरपफ घूमने चला जाता। इसी यूनिवर्सिटी रोड को सीध्s मिलाने वाली सड़क के आखिर में जहां एक और सड़क उसे काटते हुए मिलती है, आनंद भवन और स्वराज भवन स्थित हैं। ये दोनों ही घर नेहरू गांध परिवार के घर रहे हैंऋ लेकिन अब राष्ट्र की ध्रोहर हैं। ये दोनों घर जवाहर लाल नेहरू के पिता बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू द्वारा खरीदे और बनवाए गए थे। जिसे क्रमशः उनके पुत्रा जवाहर लाल नेहरू और पपौत्रााr इंदिरा गांध ने राष्ट्र को सौंप दिया। आनन्द भवन के सामने सड़क के दूसरी तरपफ भारद्वाज मुनि का आश्रम है। कहते हैं पूरब का ऑक्सपफोर्ड कही जाने वाली इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के बनने के पहले भारद्वाज मुनि का आश्रम वहीं स्थित था। जहां आज यूनिवर्सिटी स्थित है। यानी सिविल लाइंस से सटे इलाके में। मैं जब भी इलाहाबाद आता रहा हूं और बहुत ही व्यस्त नहीं रहा तो भारद्वाज मुनि के आश्रम और आनंद भवन घूमने तथा संगम में डुबकी लगाने जरूर जाता रहा हूं। लेकिन इस बार घूमने के लिहाज से नहीं बल्कि टाइम पास करने के लिहाज से जब आनंद भवन गया और दीवारों पर टंगी तस्वीरों व लिखी इबारतों को गौर से पढ़ा, देखा तो लगा कि जैसे आनन्द भवन की दीवारें महज ईंट-पत्थर और मसाले की दीवारें भर नहीं हैं बल्कि जंग-ए-आजादी का रजत पट हैं। जो हमें बहुत कुछ बताती, सुनाती और दिखाती हैं बशर्ते इन्हें देखना सुनना और पढ़ना हमें आता हो। आनंद भवन की नींव 1926 में रखी गई। नींव रखी पंडित मोतीलाल नेहरू ने। मगर नेहरू परिवार यहां रहने 1927 में आया। वास्तुकला की दशष्टि से यह भवन अनोखा है। यह दो मंजिला भवन दक्षिण से उत्तर की ओर लंबाई में पफैला है। पवेश द्वार एकदम उत्तरी छोर में है। पवेश द्वार के पास ही एक बड़ा कमरा है जो कभी बै"क के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। इस भवन में सभी कमरों के दरवाजे या तो पूरब की ओर हैं या पश्चिम की ओर। इस कारण सुबह सूरज निकलने से लेकर शाम को सूरज के डूबने तक भवन के किसी न किसी कमरे में सूरज की रोशनी बनी रहती है। जैसा कि पहले ही मैंने कहा आनन्द भवन किसी दूसरे पुराने भवन की तरह महज ईंट-पत्थर का मकान नहीं है बल्कि जंग-ए-आज़ादी के दौर की कहानी सुनाती एक जीती जागती इमारत है, एक दस्तावेज है। भारत को आजाद कराने और ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ पफेंकने के लिए यहां हुई न जाने कितनी मंत्राणाओं का यह मूक गवाह है। न जाने कितने कांग्रेसी सम्मेलनों की यहां रूप रेखा तय की गई, न जाने कितने निर्णय लिये गए। यह भवन आजादी के संघर्ष की असंख्य सपफलताओं-असपफलताओं का साक्षी रहा है। साइमन कमीशन के विरोध् की रणनीति यहीं तय हुई थी। नेहरू रिपोर्ट को अंतिम रूप यहीं दिया गया था जिसमें मुहम्मद अली जिन्ना की तमाम शर्तों पर विचार किया गया था। अयहयोग आंदोलन की दिशा क्या हो इसकी रूप रेखा भी यहीं आनंद भवन की दीवारों के साये में तय हुई थी और गांध-इरविन वार्ता के पहले की तैयारी भी यहीं हुई थी। आनन्द भवन की इन मूक दीवारों के पास बताने को इतना कुछ है कि आप पूरा-पूरा दिन इन दीवारों से सुनते रह सकते हैं। गांध जी जब भी इलाहाबाद आते थे यहीं रहते थे। यह सिपर्फ राजनीतिक विचार-विर्मश का ही केन्द नहीं था बल्कि हमारे तमाम विख्यात राजनीतिक नेताओं व चिंतकों का यह पशिक्षणस्थल भी रहा है। खान अब्दुल गफ्रपफार खां, जे.बी. कश्पलानी, लाल बहादुर शास्त्रााr, राम मनोहर लोहिया और पिफरोज गांधी जैसे युग परिवर्तक विचारक राजनेताओं के विचारों और राजनीति ने यही शक्ल इख्तियार की। यह भवन आजादी के शिल्पकारों का अड्डा तो रहा है, आजादी के बाद जिन नेताओं, विचारकों ने देश को मौजूदा स्वरूप दिया उनका भी यह अड्डा रहा है। देश के राजनीतिक इतिहास के अहम पड़ावों का साक्षी रहा यह मकान नेहरू गांध परिवार की अहम शख्सियतों की खास स्मृतियों का भी गवाह रहा है। 1942 में इंदिरा गांध और पिफरोज गांध की शाही इसी आनन्दभवन में हुई तो 1938 मे इंदिरा गांध की दादी स्वरूप रानी का निध्न इसी भवन में हुआ। आनन्द भवन जो कभी नेहरू-गांध परिवार का आशियाना रहा था। आज राष्ट्र की ध्रोहर है। 1970 में इंदिरा गांध ने इसे राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। तब इस मकान को आजादी के इतिहास के एक जीवंत संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया। आज हर दिन ;सोमवारद्ध व सभी  राष्ट्रीय अवकाशों व छुट्टियों को छोड़करद्ध सुबह 9ः30 से 5 बजे शाम तक यहां देश के कोने-कोने से हजारों लोग आते हैं और आजादी के जीवंत इतिहास से रूबरू होते हैं। इसी मकान के परिसर में एक नेहरू तारामण्डल भी स्थित है जहां बारी-बारी से हिन्दी और अंग्रेजी में समूचे ब्राह्मांड के बारे में सरल ढंग से बताया जाता है। इसलिए इलाहाबाद जाएं तो संगम में डुबकी लगाकर सिपर्फ पुरखों का तर्पण ही न करें इस ऐतिहासिक इमारत को भी देखकर आएं जहां आजाद भारत हासिल करने के लिए रणनीतियां और योजनाएं बनीं और आजाद भारत के नवनिर्माण की तरकीबें सोची गइं

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