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मनमोहन सरकार के एक साल के तीन मकार

👤 | Updated on:24 May 2010 3:42 PM GMT
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अपने पहले कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह ने कुछ उम्मीदें जगाईं थीं, जिनकी वजह से उन्हें दूसरा मौका दिया गया। अब उनके नेतश्त्व वाली यूपीए सरकार ने दूसरी पाली का भी एक वर्ष पूरा कर लिया है। इस एक साल में उनसे शिकायतें तो वही पुरानी हैं, लेकिन कुछ काम वे ऐसे कर चुके हैं जिनके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा, जैसे महिला आरक्षण विध्sयक को राज्यसभा में पारित कराना और 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए मुफ्रत व अनिवार्य शिक्षा पदान करना। बहरहाल, मनमोहन सिंह सरकार के लिए सबसे बड़ी समस्या माओवादी हिंसा बनी हुई है। यह सही है कि बतौर गश्हमंत्रााr पी चिदंबरम ने माओवादियों पर नियंत्राण करने का पयास किया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, जैसा कि दंतेवाड़ा की ताजा घटना से साबित है। गौरतलब है कि बीती 17 मई को  नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में विस्पफोट करके एक बस को उड़ा दिया जिसमें 20 विशेष पुलिस अधिकारियों सहित 40 लोगों की मश्त्यु हुई। इसी इलाके में 10 अपैल को नक्सलियों ने 76 जवानों की हत्या कर दी थी। कहने का अर्थ यह है कि माओवादी लगातार खूनी खेल, खेल रहे हैं और सरकार उन पर पूरी तरह से काबू नहीं कर पाई है। यहां यह बताना भी आवश्यक है कि नक्सली हिंसा से निपटने के लिए सरकार ने जो रणनीति अपनाई है उसके दो पहलू हैं। एक, माओवादी पभावित क्षेत्रााsं में विकास कार्य तेज करना और दूसरा यह कि पुलिस एक्शन में मुस्तैदी लाना। इसलिए केंद सरकार ने नक्सल पभावित राज्यों को 1.1 लाख अध्कि पुलिसकर्मी दिए हैं और केंदीय बलों की मौजूदगी दोगुनी कर दी है। ज्यादातर विशेषज्ञों को लगता है कि माओवादी हिंसा से निपटने के लिए केंद सरकार के कदम उद्देश्यपूर्ण और पभावी हैं। लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो समझते हैं कि सरकार के कदम अपर्याप्त हैं जिससे आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में सुधर नहीं आ रहा है। बहरलाह, अपने दूसरे कार्यकाल में यूपीए सरकार ने आतंकवाद पर कापफी हद तक काबू पाने में सपफलता अर्जित की है। पिछले 14 महीनों में केवल पुणे में ही आतंकी हमला हुआ, ध्यान रहे कि इस साल पफरवरी के मध्य में पुणे की जर्मन बेकरी में आतंकी हमला हुआ था। इसके अलावा किसी बड़ी आतंकी घटना की कोई सूचना नहीं है। हद तो यह है पिछले एक दशक में 2009 जम्मू-कश्मीर में सबसे अध्कि शांतिपूर्ण वर्ष रहा। इससे केंद को मौका मिल गया कि वह घाटी से 30 हजार केंदीय बलों को निकालकर नक्सल पभावी क्षेत्रााsं में तैनात कर दे। मणिपुर और असम को छोड़कर उत्तर-पूर्व में भी हिंसा की वारदातों में कमी आई है। सुरक्षाबलों का इस बात से भी हौंसला बढ़ा की ढाका ने उल्पफा पमुख अरबिंदा राजखोआ को भारत को सौंप दिया जिससे उम्मीद जगी कि उल्पफा अब बातचीत के लिए तैयार हो जाएगी। जहां तक शिक्षा का सम्बंध् है तो पिछला एक साल दोनों उपलब्धियों और नाकामियों से भरा रहा। उपलब्ध्यों में राइट टू एजुकेशन एक्ट लागू किया गया, सीबीएसई का दसवीं कक्षा के लिए बोर्ड रद्द किया गया, कक्षा 12वीं में विज्ञान व गणित के पा"dयक्रम समान किए गए। उच्च शिक्षा में सुधर लाने के लिए अनेक विध्sयक लाए गए, जैसे अनियमितताओं को दंडित करना, संस्थओं को पंजीकश्त करना, शैक्षिक ट्रायब्यूनल ग"ित करना और विदेशी संस्थाओं को भारत में कैंपस खोलने की अनुमति देना। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रााsं के लिए एक नई योजना बनाई गई जिसके तहत वे पापेफशनल पा"dयक्रमों के लिए रिययाती ब्याजदरों पर )ण ले सकते हैं। जहां तक शिक्षा के क्षेत्रा में इस दौरान नाकामियों की बात रही तो उनमें पमुख हैं- डीम्ड विश्वविद्यालयें की समीक्षाओं के बावजूद दोषी संस्थाओं के खिलापफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, पब्लिक पाइवेट पार्टनरशिप;पीपीपीद्ध पर आधरित 2500 मॉडल स्कूल बनाए जाने थे लेकिन ये मामला अब तक अध्र में लटका हुआ है चूंकि पीपीपी के लिए नीति निर्धरित नहीं की गई है, नवग"ित केंदीय विश्वविद्यालयों और आईआईटी में अब भी इंपफस्ट्रक्चर और पैफकल्टी की कमी है। इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में पैफकल्टी की कमी को पूरा करने के लिए ऐसी कोई नीति नहीं बनाई गई है कि योग्य व्यक्ति विदेश जाने की बजाय देश में ही अपनी सेवाएं दें। इस एक साल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह को अपनी काबीना के बेलगाम मंत्रायों से भी जूझना पड़ा। शशि थरूर जब तक विदेश राज्यमंत्रााr रहे तब तक ट्विटर पर अपनी बेलगाम बयानबाजी से सरकार के लिए नई मुसीबत खड़ी करते रहे। कभी उन्होंने हवाईजहाज की इकोनॉमी क्लास में चलने वाले लोगों को मवेशी वर्ग कहा तो कभी आईपीएल की पेफंचाइजी में कूदकर बिला वजह के बयानों से सरकार के लिए संकट खड़े किए। इसी तरह पर्यावरण मंत्रााr जयराम रमेश ने विदेशी ध्रती पर अपनी सरकार के ही दूसरे मंत्राालयों की आलोचना की जिससे मजबूरन मनमोहन सिंह को उन्हें चुप करना पड़ा। जबकि कृषि मंत्रााr शरद पवार ने कभी दूध् पर और कभी गेहूं पर गैर जरूरी टिप्पणियां की और लोगों को महंगाई से डराया। गौरतलब है कि अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार अपनी दूसरी पाली में महंगाई पर नियंत्राण करने में नाकाम रही है। महंगाई निरंतर बढ़ती जा रही है जिससे आम आदमी परेशान हो रहा है। पंचमढ़ी में लगभग 6 साल पहले कांग्रेस ने पैफसला किया था कि वह ग"बंध्न सरकार में शामिल नहीं होगीऋ लेकिन 2004 से वह ग"बंध्न सरकार का नेतृत्व करती चली आ रही है। इस सपफलता का कापफी हद तक श्रेय वित्त मंत्रााr पणव मुखर्जी को जाना चाहिए। वे कांग्रेस की ग"बंध्न सरकार के लिए संकटमोचक के तौर पर उभरकर सामने आए हैं, उन्हीं की बदौलत सरकार वित्त विध्sयक पर  विपक्ष के कटौती पस्तावों से अपनी जान बचा सकी। पणव मुखर्जी की वजह से ही आज मुलायम सिंह यादव और लालू पसाद यादव सरकार की हां में हां मिला रहे हैं, हालांकि जब सरकार ने राज्यसभा में महिला आरक्षण विध्sयक पारित कराया था तो दोनों यादव बहुत नाराज हो गए थे और लोकसभा में सरकार के लिए खतरे की घंटियां बजने लगी थीं। बतौर अर्थशास्त्रााr मनमोहन सिंह को पूंजीवाद के समर्थक के रूप में देखा जाता हैऋ लेकिन उन्हीं के कार्यकाल में रोजगार गारंटी योजना आरंभ हुई, शिक्षा का अध्कार लागू हुआ, भोजन के अध्कार की योजना आगे बढ़ी आदि।  इस आधर पर यह कहना गलत न हागा कि सोनिया गांध आम आदमी के लिए जो सपने देखती हैं उन्हें मनमोहन सिंह ने पूंजीवादी झुकाव के बावजूद साकार करने की कोशिश की है और अगर वे आगे के दिनों में महंगाई पर काबू पा लेते हैं व साथ ही महिला आरक्षण विध्sयक को लोकसभा में भी पारित कराने में कामयाब हो जाते हैं तो यह एक बड़ी उपलब्धि् होगी। शाहिद ए चौध्री  

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