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नाक की लड़ाई बनी पटना साहिब

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:14 May 2019 4:43 PM GMT
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वह कभी भाजपा के दोस्त थे, अब शत्रु हैं। लोकसभा चुनावों के अंतिम चरण में 19 मई को पटना साहिब संसदीय सीट पर पधानमंत्री के चुनाव के बाद सबकी नजरें टिकी हैं। यहां दो धुरंधरों का मुकाबला है। भारतीय जनता पार्टी ने पुराने सांसद शत्रुघ्न सिन्हा का टिकट काटकर यहां से केंद्रीय मंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता रविशंकर पसाद को उम्मीदवार बनाया है। दो बार से भाजपा के लिए यह सीट जीतने वाले शत्रुघ्न सिन्हा को भी अंदाजा था कि भाजपा उन्हें चुनावी मैदान से बाहर का रास्ता दिखा सकती है इसलिए समय रहते उन्होंने भाजपा को अलविदा करने और कांग्रेस का दामन थामने की रणनीति तैयारी की। शत्रुघ्न पिछले दो चुनावों से पटना साहिब सीट जीतकर भाजपा की झोली में डालते रहे हैं। लेकिन इस बार उनका मुकाबला भाजपा पत्याशी से होगा। भाजपा बनाम कांग्रेस के बीच यहां जीत किसी के लिए आसान नहीं होगी। जहां शत्रु जीत की हैट्रिक लगाने की फिराक में हैं वहीं रविशंकर पसाद पहली बार यहां से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। पटना साहिब सीट पर जातीय समीकरण के आधार पर कायस्थों का दबदबा है। लगभग 5 लाख से ज्यादा कायस्थों के बाद यादव और राजपूत मतदाताओं की संख्या है। सामान्य तौर पर यहां के कायस्थ वोटरों का झुकाव भाजपा की तरफ रहता है, लेकिन इस बार दोनों ही तरफ के कायस्थ चेहरे खड़े होने की वजह से वोट बंटने के कयास लगाए जा रहे हैं। पटना साहिब लोकसभा सीट में छह विधानसभा सीटों में बख्तियारपुर, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, दीघा और फतुहा सीटें शामिल है। इनमें पांच सीटें भाजपा के पास हैं। सिर्प फतुहा सीट राजद के पास है। वर्ष 2015 में विधानसभा चुनाव हुआ था तब बिहार में अधिकतर सीटें महागठबंधन ने जीती थीं। शाटगन के रूप में जाने जाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा ने बताया कि सपा-बसपा गठबंधन के नेता चाहते थे कि वह लखनऊ से अपने उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ें लेकिन जब मैंने कहा कि मैं अपनी सीट से लड़ने के लिए पतिबद्ध हूं तो उन्होंने पूनम के नाम का सुझाव दिया। सिन्हा ने कहा कि उन्हें पटना साहिब के मतदाताओं पर पूरा भरोसा है जिन्होंने हमेशा समर्थन किया है, मुझे आशीर्वाद दिया है और मुझे रिकार्ड अंतर से जिताने में मदद की। इस बार भी ऐसा ही होगा। महागठबंधन की वजह से शत्रु को कायस्थ वोटों के अलावा मुस्लिम और यादव समुदाय का भी वोट मिल सकता है। वहीं रविशंकर पसाद को भी कायस्थों के वोट को अपनी ओर खिंचने की चुनौती होगी। साथ ही जदयू के साथ होने की वजह से उन्हें कुर्मी और अति पिछड़े वोटों का भी लाभ मिल सकता है। मोदी की लोकपियता पर सवार रविशंकर पसाद शत्रु को कड़ी टक्कर देने की क्षमता रखते हैं। चंद्र गुप्त मौर्य और समुद्र गुप्त जैसे पराकमी शासकों की यह राजधानी रही है। कौटिल्य जैसे विद्वान यहां रहे और अर्थशास्त्र जैसी रचना की। इस पवित्र भूमि पर क्या शत्रुघ्न सिन्हा हैट्रिक लगा सकते हैं!

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