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स्किन टच के बिना भी पॉस्को

👤 Veer Arjun | Updated on:23 Nov 2021 4:45 AM GMT

स्किन टच के बिना भी पॉस्को

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-अनिल नरेन्द्र

सुप्रीम कोर्ट ने पॉस्को एक्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी। कोर्ट ने कहा—पॉस्को एक्ट की धारा-7 के तहत पीिड़ता के साथ स्किन टू स्किन सम्पर्व नहीं हुआ तो तब भी उसे यौन उत्पीड़न माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईं कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि स्किन टू स्किन टच न होने के कारण कपड़े के ऊपर से स्पर्श यौन शोषण नहीं कहा जा सकता। इस पैसले को अटॉना जनरल केके वेणुगोपाल, महाराष्ट्र सरकार और राष्ट्रीय महिला आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रविन्दर भट्ट और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने इस मामले में पैसला सुनाया।

जस्टिस एम. त्रिवेदी ने 38 पेज के पैसले को पढ़ते हुए कहा—ऐसे मामले में यौन हिसा का इरादा ज्यादा मायने रखता है बजाय इसके कि स्किन टू स्किन टच हुआ या नहीं। पॉस्को एक्ट की धारा-7 के तहत स्पर्श को सीमित करना बेतुका है। यह इस कानून का उद्देश्य नष्ट कर देगा। यह भी कहा कि अगर बॉम्बे हाईं कोर्ट द्वारा दी गईं व्याख्या को अपनाया जाता है तो कल को कोईं अपराधी यौन शोषण करते समय दस्ताने का प्रायोग करेगा और उसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकेगा। यह एक बेतुकी स्थिति होगी। दरअसल 12 साल की पीिड़ता के यौन मामले में सेशन कोर्ट ने 39 साल के आरोपी संतोष को पॉस्को एक्ट में तीन साल व आईंपीसी की धारा 354 में एक साल की सजा सुनाईं थी। पीिड़त के मुताबिक दिसम्बर 16 में संतोष उसे खाना देने के बहाने घर ले आया था। वहां गलत तरीके से छुआ था। बता दें कि बच्चों के प्राति यौन उत्पीड़न और बच्चों की पोर्नग्राफी जैसे जघन्य अपराधों को रोकने के लिए 2012 में पॉस्को एक्ट बनाया गया। इसमें कम से कम तीन साल और अधिकतम उम्रवैद तक की सजा है। सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता ने बताया कि पॉस्को एक्ट के तहत बच्चों को यौन इरादे से घूरना, अश्लील संदेश भेजना, अश्लील संदेश पढ़ाना, अश्लील साहित्य दिखाना इत्यादि बातों को भी अपराध माना गया है। बॉम्बे हाईं कोर्ट की नागपुर बेंच ने संबंधित एक मामले में आदेश दिया था कि क्योंकि आरोपी और पीिड़ता के बीच त्वचा से त्वचा का सम्पर्व नहीं हुआ है यानि नाबालिग के गोपनीय अंग को बिना कपड़ा छूना सेक्सुअल असाल्ट नहीं है तो पॉस्को एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न का अपराध नहीं बनता। इस पैसले का भारी विरोध हुआ था और इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में तीन याचिकाएं लगाईं गईं थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाईं करते हुए कहा कि यौन मंशा से किया गया शारीरिक सम्पर्व पॉस्को एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न ही माना जाएगा। जब कानून बनाने वाली विधायिका ने उसे बनाते समय अपना इरादा साफ जाहिर किया हो तो अदालतें उसमें भ्रामक अस्पष्टता पैदा नहीं कर सकतीं। अदालत ने बड़ा सवाल उठाया कि यदि कोईं दस्ताने पहनकर अपराध करे तो सजा वैसे होगी? बच्चों के मामले बहुत संवेदनशील होते हैं, अकसर वह अपने साथ हो रही हरकतों को समझ नहीं पाते या किसी को बता नहीं पाते। उन्हें हर हाल में यौन अपराधियों से सुरक्षित किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

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