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जिस अलकायदा को खत्म करने के लिए 20 साल लड़े, अब फिर सिर उठाएगा

👤 Veer Arjun | Updated on:14 Sep 2021 5:00 AM GMT

जिस अलकायदा को खत्म करने के लिए 20 साल लड़े, अब फिर सिर उठाएगा

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-अनिल नरेन्द्र

20 साल पहले अमेरिका ने 9/11 आतंकी हमले के जवाब में अफगानिस्तान में कदम रखा था। यह हमला आतंकी संगठन अलकायदा ने किया था, जिसका तालिबान समर्थक है। अब दुनिया को यह चिंता है कि क्या अब फिर से अफगानिस्तान में अलकायदा, आईंएसआईंएस जैसे आतंकी संगठनों को सुरक्षित पनाह मिलेगी? तालिबान की जीत को दुनिया आतंक प्रसार की बड़ी आशंका के तौर पर देख रही है। अलकायदा वही समूह है जिसने 11 सितम्बर 2001 में अमेरिका पर हमला किया था जिसके बाद अमेरिका नीत नाटो बलों ने उसका सफाया करने के लिए अफगानिस्तान युद्ध की शुरुआत की थी। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और तालिबान के उभरने पर ट्रंप प्राशासन में आतंकवाद रोधी महकमे में वरिष्ठ निदेशक रहे क्रिस कोस्टा ने कहा—मेरे ख्याल में अलकायदा के पास मौका है और वह इस अवसर का फायदा उठाएगा। हर जगह के जेहादियों को प्रोरित करने वाला घटनाक्रम है।

आतंक विरोधी पूर्व अमेरिकी समन्वयक नाथन सेल्स कहते हैं—तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जे से अमेरिका के लिए आतंक का जोखिम बढ़ेगा। यह लगभग निश्चित है कि अलकायदा को अफगानिस्तान में सुरक्षित पनाह मिलेगी। ब्रिटेन के प्राधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अफगानिस्तान के संकट पर जी-7 देशों की आपात बैठक की अध्यक्षता करने से पहले कहा कि तालिबान को उसके कामों से आंका जाएगा न कि उसके कहे शब्दों से। अमेरिका के रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टन ने इस बात की आशंका जताईं है कि अफगानिस्तान में तालिबान शासन के दौरान अलकायदा फिर खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि हम तालिबान को पहले से ही अलकायदा से दूर रहने की चेतावनी दे चुके हैं। अमेरिकी रक्षामंत्री चार दिन की खाड़ी देशों की यात्रा के दौरान वुवैत शहर में पत्रकारों से वार्ता कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि अलकायदा को लेकर हमारी तैयारी पूरी है। हम तालिबान को आगाह करते हैं कि वह अफगानिस्तान की जमीन अलकायदा को इस्तेमाल न करने दे। फरवरी 2020 में तालिबान ने ट्रंप प्राशासन से यह समझौता किया है कि यह भविष्य में अलकायदा या ऐसे किसी भी अन्य संगठन का समर्थन नहीं करेगा, जो अमेरिका को धमकी देते हैं। लेकिन ऐसा कम ही लगता है कि तालिबान समझौते का पूरी तरह से पालन करेगा। याद रहे कि अलकायदा की वफादारी में पड़ी थी आईंएसआईंएस की नींव। इराक में 2003 से 2011 तक चले गृहयुद्ध में आतंकी समूह इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया ने जड़ें जमाईं। इसकी शुरुआत 1999 में अबू मुसाब अल-जरकावी ने जमात अल तवाहिद वल जेहाद नाम के आतंकी संगठन से की थी। 2004 में जरकावी ने अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के प्राति वफादारी जाहिर की थी।

तब जेटीजे का नाम जेटीजे अलकायदा इन इराक हो गया। फरवरी 2006 में अलकायदा इन इराक ने मुजाहिद्दीन शूरा काउंसिल बनाईं। फिर जरकावी की मौत हो गईं। अबू अब्दुल्ला-अल-राशिद-अल-बगदादी के सरगना बनने के बाद अक्तूबर 2006 को अलकायदा इन इराक का नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक हो गया। अप्रौल 2010 में बगदादी मारा गया। फिर अबू बकर अल बगदादी सरगना बना। उसने नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवंट (आईंएसआईंएल) कर दिया। बक्कर ने 2014 में खुद को खलीफा घोषित कर दिया। 2015 में उसने अफगानिस्तान में अपना आईंएस खुरासान गुट भी खड़ा कर लिया। इसके खिलाफ अलकायदा ने लड़ाईं लड़ी। बाद में दोनों तालिबान के लिए लड़ने लगे। खतरा सिर्प अलकायदा खड़ा होने का नहीं है बल्कि आईंएस का भी है।

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