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2024 से पहले सत्ता का सेमीफाइनल

👤 Veer Arjun | Updated on:12 Jan 2022 4:45 AM GMT

2024 से पहले सत्ता का सेमीफाइनल

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—अनिल नरेन्द्र

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रादेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। कोरोना महामारी की चुनौतियों के बीच हो रहे यह चुनाव कईं मायनों में महत्वपूर्ण साबित होंगे। 10 मार्च को पता चल जाएगा कि 2024 से पहले सत्ता के सेमीफाइनल के बाद देश की सियासत किस दिशा में मुड़ती दिख रही है। इतना तय है कि इन पांच राज्यों के चुनाव के असर तात्कालिक से लेकर दूरगामी तक होंगे। देश की सियासत पर भी असर देखने को मिलेगा। इस चुनाव में सत्तापक्ष और विपक्ष की साख दांव पर रहेगी। देश की राजनीति को चुनाव नतीजे इन पांच मोर्चो पर तुरन्त प्राभावित कर सकते हैं। चुनाव नतीजों का सबसे पहले असर इस साल जुलाईं में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा।

अगर पांच राज्यों के परिणाम पिछली बार की तरह आए तब तो सत्तारूढ़ भाजपा अपनी पसंद का राष्ट्रपति आसानी से चुन लेगी। लेकिन अगर उलटपेर हुए या नजदीकी मामले रहे तो भाजपा को इस बार दिक्कत आ सकती है। क्योंकि पिछले वुछ सालों से भाजपा का तमाम विधानसभा चुनावों में प्रादर्शन अपेक्षावृत कमजोर रहा है। कईं बड़े राज्यों में भाजपा के पास विधायकों के नम्बर नहीं हैं। इस साल राज्यसभा की सूरत भी बदलेगी। इस साल जुलाईं तक राज्यसभा की 73 सीटों पर चुनाव होंगे यानि कि एक-तिहाईं सीटों पर चुनाव होंगे। जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उस हिसाब से कांग्रोस और विपक्षी दलों को इस बार भाजपा के सामने हल्की बढ़त मिल सकती है। ऐसे में इन पांच राज्यों के परिणाम संसद के ऊपरी सदन की तस्वीर तय करेंगे। भाजपा के लिए राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पसंद के उम्मीदवार को चुनने के अलावा राज्यसभा में भी दबदबा रखने के लिए इन राज्यों में पुराना प्रादर्शन दोहराने का दबाव होगा। वहीं विपक्ष यहीं से भाजपा को कमजोर करना चाहेगा। 2019 में आम चुनावों में बड़ी जीत मिलने के बाद से भाजपा अलग-अलग मोर्चो पर संकट में रही है। चाहे गवर्नेस का मामला हो या सियासत की पिच, भाजपा के लिए उतार-चढ़ाव भरे संकेत रहे हैं। ऐसे में 2022 की शुरुआत में होने वाले इस चुनाव से भाजपा दिखाना चाहेगी कि अब भी देश की राजनीति वेंद्र में है और नरेंद्र मोदी की अगुवाईं में पाटा 2024 से पहले अपने स्वाभाविक एडवांटेज के रूप में अपनी शुरुआत करेगी।

पांच राज्यों के नतीजे क्षेत्रीय ताकतों की विस्तारवादी हसरतों की हकीकत दिखाएंगी। आम आदमी पाटा (आप) पंजाब के अलावा गोवा और उत्तराखंड, उत्तर प्रादेश में भी उतरी है तो वहीं गोवा में टीएमसी भी किस्मत आजमाएगी। अगर अरविन्द केजरीवाल और ममता बनजा की पाटा ने अपनी छाप छोड़ दी तो उसका असर देश की राजनीति पर देखने को मिल सकता है। लेकिन अगर वह वुछ उल्लेखनीय करने में विफल रहे तो उन पर भी सवाल उठेंगे। पांच राज्यों के चुनाव का सबसे अधिक असर कांग्रोस पर भी देखा जा सकता है। माना जा रहा है कि कांग्रोस के अंदरूनी गणित और गांधी परिवार के लिए यह चुनाव 2019 आम चुनाव से भी अधिक महत्व भरा है। अगर कांग्रोस के लिए इस बार अपेक्षित परिणाम नहीं आए तो पाटा के अंदर बगावत देखने को मिल सकती है। इसलिए हर लिहाज से इन चुनावों के 2024 से पहले सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा।

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