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साईं बाबा के महानिर्वाण के 100 वर्ष

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-03-04 16:21:58.0

साईं बाबा के महानिर्वाण के 100 वर्ष

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रौशन सांकृत्यायन

शिर्डी के साईं बाबा की जीवनी गोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर ने लिखी है, जिन्हें साईं बाबा ने हेमाडपंत नाम दिया था। साईं बाबा ने अक्टूबर 1918 में इस संसार से पर्दा किया था, इसलिए 2018 उनके महानिर्वाण का शताब्दी वर्ष है। साईं बाबा के अदभुत जीवन और अमूल्य उपदेशों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। इन्हीं फ्रसंगों में से एक गुरु की आवश्यकता के सन्दर्भ में है, जिसे यहां दोहराना फ्रेरणादायक है।
दाभोलकर जब पहली बार शिर्डी पहुंचे तो उनकी बालासाहेब भाटे से गुरु की आवश्यकता पर गर्मागर्म बहस छिड़ गई। दाभोलकर का मानना था कि स्वतंत्रता त्यागकर किसी पर आश्रित नहीं होना चाहिए, जब कर्म करना ही पड़ता है, तो गुरु की आवश्यकता ही कहां रह जाती है? इन विचारों को अधिक बल देते हुए दाभोलकर ने कहा, "फ्रत्येक को पूर्ण फ्रयत्न कर स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए। गुरु शिष्य के लिए करता ही क्या है? वह तो सुख से नींद का आनंद लेता है।' इस तरह दाभोलकर ने स्वतंत्रता का पक्ष लिया, जिसका बालासाहेब ने जमकर विरोध किया।
बालासाहेब का मत था कि भाग्य में जो कुछ लिख दिया गया है वह निश्चित होकर रहेगा, इसमें बड़े से बड़ा महापुरुष भी कुछ कर नहीं सकता है, खासकर इसलिए कि `मेरे मन कछु और है, विधाता के कछु और' बहुत पुरानी कहावत होने के बावजूद भी एकदम सही है। इसके बाद बालासाहेब ने लगभग सलाह देते हुए कहा, "भाई साहब, यह निरी विद्वत्ता छोड़ दो। यह अहंकार तुम्हारी कुछ भी सहायता न कर सकेगा।' इस तरह दोनों व्यक्तियों के खंडन-मंडन मंअ लगभग एक घंटा व्यतीत हो गया और हमेशा की तरह कोई निष्कर्ष न निकल सका। जैसा कि अकसर होता है, तंग व विवश होकर वाद-विवाद को किसी बेहतर दिन के लिए स्थगित कर दिया गया।
लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि दाभोलकर की `मानसिक शांति भंग हो गई। जब तक घोर दैहिक बुद्धि व अहंकार न हो, तब तक विवाद संभव नहीं। वस्तुतः यह अहंकार ही विवाद की जड़ है। खैर, जब अन्य लोगों के साथ दाभोलकर मस्जिद गए, तब साईं बाबा ने काकासाहेब को संबोधित कर सवाल किया कि सा"sवाडा में क्या चल रहा था? किस विषय में विवाद चल रहा था? फिर दाभोलकर की तरफ देखते हुए बाबा ने कहा, "इन `हेमाडपंत' ने क्या कहा?' यह शब्द सुनकर दाभोलकर को अधिक आश्चर्य हुआ। सा"sवाडा और मस्जिद में काफी फासला था। वह सोचने लगे- सर्वज्ञ या अंतर्यामी हुए बिना बाबा को विवाद का ज्ञान कैसे हो सकता था? दाभोलकर अपने लिए `हेमाडपंत' संबोधन से भी असमंजस में पड़ गए।
गौरतलब है कि `हेमाडपंत' `हेमाद्रिपंत' का अपभ्रंश है। हेमाद्रिपंत कवि, विद्वान होने के साथ ही देवगिरी के यादव राजवंशी महाराजा महादेव व रामदेव के विख्यात मंत्री थे। उन्होंने ही हिसाब-किताब रखने की नवीन फ्रणाली यानी बहीखाते का अविष्कार किया था। उनके मुकाबले में दाभोलकर अपने को अज्ञानी समझते थे। इसलिए वह यह न समझ पाए कि बाबा ने उन्हें इस विशेष उपाधि से विभूषित क्यों किया? यह उनके अहंकार को नष्ट करने का फ्रयास था या उनकी फ्रशंसा थी? लेकिन बाद में दाभोलकर पर `हेमाडपंत' की उपाधि एकदम सही बै"ाr। उन्होंने साईं बाबा संस्थान का अच्छा फ्रबंधन किया और और महाकाव्य `साईं सच्चरित्र' की रचना भी की।
बहरहाल, बाबा के दर्शन करने के दूसरे दिन `हेमाडपंत' और काकासाहेब दीक्षित ने मस्जिद में जाकर घर लौटने की अनुमति मांगी। बाबा ने जैसे ही स्वीकृति दी कि किसी ने फ्रश्न किया-
"बाबा, कहां जाएं?'
बाबा, "ऊपर जाओ।'
फिर फ्रश्न हुआ, "मार्ग कैसा है?'
बाबा, "अनेक पथ हैं। यहां से भी एक मार्ग है। लेकिन यह मार्ग दुर्गम है। इसमें शेर व भेड़िये भी मिलते हैं।'
काकासाहेब, "अगर पथ फ्रदर्शक भी साथ हो तो?'
बाबा, "तब कोई कष्ट न होगा। पथ फ्रदर्शक तुम्हारी शेर, भेड़िये व खन्दकों से सुरक्षा करेगा। तुम्हें सीधे मार्ग पर चलाता हुआ तुम्हारी मंजिल तक पहुंचा देगा। लेकिन उसके अभाव में जंगल में मार्ग भूलने या गड्ढे में गिर जाने की आशंका रहती है।'
यह वार्तालाप सुनकर दाभोलकर उर्फ `हेमाडपंत' को अपनी भूल का एहसास हो गया। जो कुछ बाबा कह रहे थे उससे उन्हें इस फ्रश्न का उत्तर मिल गया कि गुरु की आवश्यकता क्यों है ? उन्होंने हमेशा के लिए अपने मन में यह गां" बांध ली कि परमार्थ-लाभ केवल गुरु के उपदेश पालन में ही निहित है। राम और कृष्ण महान अवतारी थे, लेकिन उन्हें भी आत्मानुभूति के लिए गुरु की आवश्यकता पड़ी। राम को अपने गुरु वशिष्" और कृष्ण को अपने गुरु संदीपनि की शरण में जाना पड़ा था। इस मार्ग में फ्रगति करने के लिए केवल दो ही गुण सहायक हैं- श्रद्धा व सबूरी (धैर्य)। साईं बाबा के उपदेशों का आधार भी बस यही दो गुण हैं।

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