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विशाखापट्टनम गैस रिसाव कांडः कब मिलेगा न्याय!

👤 mukesh | Updated on:26 May 2020 9:54 AM GMT

विशाखापट्टनम गैस रिसाव कांडः कब मिलेगा न्याय!

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- अरविंद कुमार शर्मा

कोरोना के इस दौर में विशाखापट्टनम के बाहरी इलाके में एलजी पॉलिमर्स की फैक्ट्री के आसपास कई लोगों की मौत की घटना पर चर्चा कम ही हो रही है। सात मई को अभी सुबह हुई नहीं हुई थी कि अचानक हवा में अजीब बदबू के साथ लोगों की आंखों में खुजली और जलन होने लगी। भागते हुए लोगों की सांस घुटने लगी तो लगा कोई जानलेवा गैस उनका पीछा कर रही है। हालत यह थी कि कई लोग सांस लेने की जद्दोजहद में सड़कों पर ही गिर गये। पड़ोसियों और फिर प्रशासन के सहयोग से हजारों लोग बाहर निकाले गये। सैकड़ों लोगों को अस्पतालों में भर्ती कराना पड़ा। इस गैस लीक हादसे में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई। गाय, भैंस और कुत्ते समेत 32 जानवर भी इस गैस के शिकार हो गये थे। विशेषज्ञ बताते हैं कि लोगों को अब नियमित स्वास्थ्य जांच से गुजरना पड़ेगा क्योंकि स्थानीय लोगों के शरीर में अभी स्टाइरीन गैस का असर लंबे समय तक रह सकता है। प्रश्न यह है कि इस हादसे के लिए कौन जिम्मेदार है और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होनी चाहिए।

विशाखापट्टनम के बाहरी क्षेत्र में यह फैक्ट्री 1961 में बनी थी। तब से कंपनी के आसपास कई क्षेत्र आबाद हो चुके हैं। इस फैक्ट्री में स्टाइरीन के पॉलिमर्स बनाये जाते हैं। दरअसल, यह एक ज्वलनशील द्रव है और इसका उपयोग बहुपयोगी प्लास्टिक बनाने में होता है। यह प्लास्टिक फ्रिज और एयरकंडीशनर्स से लेकर फूड कंटेनर्स और डिस्पोजेबल टेबलवेयर्स बनाने में लगाई जाती है। स्टारीन चूंकि तेजी से भाप बनकर उड़ने वाली गैस है, इसलिए इसे टैंकों में 20 डिग्री सेंटिग्रेड के नीचे के तापमान में रखा जाता है। इस तापमान पर लगातार निगरानी रखना जरूरी होता है। दुर्घटना के दिन सात मई को तापमान बढ़ा हुआ था। लॉकडाउन में कुछ छूट मिलने पर जब फैक्ट्री चलाने के लिए साफ-सफाई की जा रही थी, उसी समय गैस लीक करने लगी थी। साफ बात है कि तब टैंकों के तापमान पर नजर नहीं रखी गई।

तय हो गया है कि एलजी केम. की इस फैक्ट्री में दुर्घटना स्टाइरीन गैस के वाष्प बनकर बाहर आने के कारण हुई। अब जांच के बाद जानकारी मिल रही है कि गैस वाले टैंकों पर निगरानी के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी तीन पालियों में लगाई जाती थी। इस बीच कंपनी में एक ही पाली में काम चल रहा था। पुलिस ने कंपनी प्रबंधन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर लिया है। स्वाभाविक है कि गैस लीक करने का इरादा किसी का भी नहीं रहा होगा। फिर भी जहां इस तरह के गैस की मौजूदगी हो, ऐसी लापरवाही कैसे बर्दास्त की जा सकती है। अब तो यह भी पता चला है कि प्लांट चलाने के लिए जिन पर्यावरण क्लियरेंस की जरूरत थी, वे नहीं लिए गए थे। यानी कंपनी के साथ वह तंत्र भी इसके लिए दोषी सिद्ध हो सकता है, जिसने कंपनी चलाने के मानकों में ढील दी है। जिन परिवारों के अपने लोग इस हादसे का शिकार हुए उन्हें तो सिर्फ न्याय से मतलब है।

यह गैस किस कदर खतरनाक है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुर्घटना के 15 दिन बाद भी पूरे इलाक़े में गैस की बदबू फैली हुई थी। फैक्ट्री के सामने के पेड़ तक बदरंग हो चुके हैं। यहां केले की खेती बड़े पैमाने पर होती है। हादसे के बाद आसपास के बागानों में केले के पेड़ काले पड़ चुके हैं और पत्थर जैसे हो गये हैं। जांच के लिए इस इलाक़े के पानी, मिट्टी और सब्जियों तक के सैंपल लिए गए हैं। लोगों को यहां के स्थानीय खाद्य उत्पाद और पानी के उपयोग से बचने की सलाह दी गई है।

दुर्घटना के बाद चाहे जितनी सावधानी बरती जाय, सवाल लापरवाहियों और अनदेखियों का है। हाल ये है कि वर्ष 2017 के बाद से इस फैक्ट्री का सायरन तक नहीं बजा है। इमरजेंसी सायरन के बारे में भी विवादपूर्ण दावे किए जा रहे हैं। फिर लॉकडाउन के बाद जब साफ-सफाई चल रही थी, गैस वाले टैंकों का तापमान भी ठीक नहीं रखा जा सका। इसे ठीक रखने के लिए पानी के छिड़काव वाली मशीन खराब मिली थी। अब जो जानकारियां बाहर आ रही हैं, उनके मुताबिक 2016 में श्रम विभाग ने अपनी रिपोर्ट में इन टैंकों के प्लास्टर वाले सीमेंट के झड़ने पर आपत्ति की थी। फिर इन टैंकों के चारों ओर सुरक्षा दीवार भी नहीं थी।

अब तो पता चल रहा है कि एलजी पॉलिमर्स के इस प्लांट के लिए 2017 से ही पर्यावरण क्लियरेंस नहीं लिया जा रहा था। फिलहाल राज्य प्रदूषण बोर्ड के प्रमाणपत्र से ही काम चल रहा था। अजीब बात है कि हमारे देश में 1984 के भोपाल यूनियन कार्बाइड प्लांट वाले गैस रिसाव की दुर्घटना के बाद भी ऐसी फैक्टिरयां नियम-कानून की धज्जियां उड़ा रही हैं। भोपाल के उस हादसे में हज़ारों लोग मारे गए थे और करीब पांच लाख लोग स्थायी रूप से विकलांगता के शिकार हो गए थे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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