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बिना विज्ञापन की वर्षगांठ

👤 mukesh | Updated on:1 Jun 2020 11:58 AM GMT

बिना विज्ञापन की वर्षगांठ

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- डॉ. रमेश ठाकुर

केंद्र सरकार की छठी वर्षगांठ विज्ञापन रहित और बिना जलसे की मनाई गई। 30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा हो गया। पहली वर्षगांठ बेहद सरल और सादगी से मनाई गई। देश में फैले कोरोना वायरस और लॉकडाउन के कारण सरकार और पार्टी द्वारा किसी तरह का कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। जबकि, ऐसे विशेष दिनों के लिए सरकार की उपलब्धियों को जनमानस तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्र और न्यूज चैनल ही वह माध्यम होते हैं जिन्हें करोड़ों का विज्ञापन देकर प्रसार-प्रचार किया जाता है। लेकिन इसबार ऐसा नहीं किया गया। किसी मीडिया संस्थान को विज्ञापन नहीं दिया। ऐसा भी नहीं हुआ कि मीडिया को विज्ञापन नहीं देने से सरकार की बात देशवासियों तक नहीं पहुंची बल्कि विज्ञापन से ज्यादा जनमानस तक सरकार का संवाद हुआ।

गौरतलब है इसके लिए सरकार ने इसबार नया तरीका इजाद किया। प्रचार भी हो और पैसा भी खर्च न हो! दरअसल, पार्टी ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाया। वहीं, प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदुस्तान की जनता के नाम खुद एक पत्र लिखा, जिसमें तमाम चुनौतियों और सफलताओं पर अपने मन की बात जनता से कही। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने एक ऑडियो संदेश भी देशवासियों के नाम जारी किया गया। मोदी सरकार ने पहले कार्यकाल के शुरुआती चार वर्षों में करीब पांच हजार करोड़ प्रचार-प्रसार में खर्च किए थे, जिसका विपक्षी पार्टियों ने लोकसभा चुनाव में मुद्दा भी बनाया था। हालांकि उस विरोध का उन्हें ज्यादा फायदा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी तो उस वक्त भी जमकर पैसा प्रचार में खर्च हुआ था। कांग्रेस अगर जोर-शोर से इस मुद्दे को उठाती तो उन्हें भी जबाव देना पड़ता। इसलिए मुद्दा उठने से पहले ही शांत हो गया था।

शायद उन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नया तरीका इजाद किया हो। बहरहाल उनका तरीका सफल भी हुआ। मीडिया के जरिए सरकार का प्रचार-प्रसार भी हुआ और धन भी खर्च नहीं हुआ। देशवासियों को प्रधानमंत्री के इस निर्णय की दाद देनी चाहिए क्योंकि जनता की कमाई का पैसा उन्होंने बर्बाद नहीं होने दिया। कोरोना संकट में धन की कितनी आवश्यकता है, शायद किसी को बताने की जरूरत नहीं। विकराल स्थिति को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री ने सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए बर्बाद होने से बचाए। केंद्र सरकार का पहला वर्ष निश्चित रूप से उपलब्धियों के लिहाज से इतिहास के सुनहरे पन्ने में दर्ज हुआ है। बीते वर्ष सदियों का नासूर जम्मू-कश्मीर का मसला सुलझाया गया। आर्टिकल 35ए और धारा-370 का खात्मा किया गया। वहीं, कोर्ट के माध्यम से राममंदिर निर्माण का हल भी निकला। इसके अलावा और भी कई एतिहासिक फैसले सरकार द्वारा लिए गए।

तीस मई को केंद्र सरकार ने अपना पहला वर्ष पूरा किया। उस दिन देश के तकरीबन सभी अखबारों में हुकूमत का लेखा-जोखा और उसकी उपलब्धियों को आलेखों के जरिए बताया। लोगों ने विस्तार से पढ़ा और इसे काबिले तारीफ कदम बताया। केंद्र के शीर्ष मंत्रियों जैसे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह व रेलमंत्री पीयूष गोयल और सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आदि वरिष्ठ नेताओं ने ज्यादातर हिंदी एवं अंग्रेजी अखबारों में खुद आलेख लिखे। लेखों में अपनी सरकार का लेखा-जोखा विस्तार से लिखा। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक खुला पत्र देशवासियों के नाम लिखा, जिसके जरिए उन्होंने देशवासियों से संवाद स्थापित किया। उनके पत्र को कई मीडिया संस्थानों ने अपने प्रमुख आलेखों में जगह दी। कमोबेश, यही अगर विज्ञापन के माध्यम से किया जाता तो भारी मात्रा में विज्ञापनरूपी धन मीडिया संस्थानों को देना पड़ता। कुल मिलाकर ये नया चलन देशहित में है।

गौरतलब है कि यूपीए में मनमोहन सरकार ने अपने दस वर्ष के कार्यकाल में विज्ञापन पर 2,658 करोड़ खर्च किए थे। वहीं, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के शुरुआती चार साल में ही पांच हजार करोड़ रुपए प्रचार और विज्ञापनों पर खर्च किए थे जिसमें सिर्फ न्यूज चैनलों पर 2208 करोड़ के विज्ञापन दिए गए। इतने ही प्रिंट मीडिया में खर्च हुए थे। विज्ञापन में खर्च किया गया धन विपक्ष के लिए मुद्दा तो कभी नहीं बना। पर, यदा-कदा सोशल मीडिया पर सामाजिक स्तर पर आवाजें जरूर उठी। वह तो गनीमत है कि सूचना के अधिकार के बदौलत ये जानकारी समय-समय पर सार्वजनिक होती रहीं। वरना पता ही नहीं चलता कि सरकारें कितना पैसा प्रचार में बहाती हैं। केंद्र सरकार को बेवजह धन खर्च को लेकर भी कानून बनाना चाहिए, खर्च करने की समय सीमा तय होनी चाहिए। साथ ही जवाबदेही भी किसी न किसी की होनी चाहिए।

प्रचार में पैसों की बर्बादी का ताजा उदाहरण इस समय हमारे सामने है। दिल्ली सरकार कोरोना संकट में सबसे ज्यादा विज्ञापन दे रही है। अखबारों के कई-कई पन्ने अपनी वाहवाही से पुते होते हैं और चैनलों पर कई मिनट के विजुअल विज्ञापन चल रहे हैं। यही कारण है कि कोरोना को लेकर इस वक्त दिल्ली में भय स्थिति होने के बावजूद केजरीवाल सरकार की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठ रहा? खैर, जो तरीका इसबार केंद्र सरकार ने विज्ञापनरहित का अपनाया है, उम्मीद है यह सिलसिला बदस्तूर आगे भी जारी रहेगा। क्योंकि अगर सरकारें और सियासी दल ईमानदारी और लगन से काम करें तो उन्हें प्रचार की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। उपलब्धियों का प्रचार अपने आप हो जाता है। उदाहरण के तौर पर जब कश्मीर से धारा-370 हटाई गई तो पूरा देश एक सुर में सरकार की वाहवाही करने लगा था। उम्मीद है मोदी सरकार विज्ञापनरहित मसले पर गंभीरता से विचार करेगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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