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राष्ट्र की रक्षा में शस्त्र पूजन का महत्व

👤 mukesh | Updated on:26 Oct 2020 8:48 AM GMT

राष्ट्र की रक्षा में शस्त्र पूजन का महत्व

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- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

विजयादशमी का पर्व सम्पूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह पर बुराई पर अच्छाई की जीत, असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में मनया जाता है। इससे पहले हम 9 दिन तक भक्ति के साथ शक्ति की आराधना करते हैं। शक्तिरूपा मां की पूजा अर्चना कर उनका शत्रुनाश के लिए उनका आह्वान करते हैं और दशमी के दिन रावण का दहन कर यह पर्व पूर्ण होता है। इसी दिन भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही परम्‍परागत शस्त्र, शास्त्र और शक्ति पूजन किया जाता रहा है। बीच के कालखंड में हमने शस्त्र पूजन के महत्व को नहीं पहचाना। देश के वर्तमान रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भारत की इस प्राचीन परम्परा के महत्व को न केवल पहचाना और सम्मान दिया बल्कि वे उसकी अनुपालना भी कर रहे हैं। यह आत्मनिर्भर और शक्तिशाली भारत की एक झांकी प्रस्तुत करता है और मन में विश्वास जगाता है।

इस वर्ष विजयादशमी के पर्व पर देश के रक्षामंत्री ने दार्जिलिंग के सुकना में भारतीय सैनिकों के बीच रहकर शस्त्र पूजन में भाग लिया। वे इसके बाद भारत-चीन सीमा के पास सिक्किम राज्य में कई परियोजनाओं का उद्घाटन करने जाने वाले थे। मौसम खराब होने के चलते उन्होंने वर्चुअल माध्यम से उन योजनाओं के शुभारंभ की घोषणा की। पूर्वी लद्दाख की सीमा पर जब भारत-चीन की सेनाएं आमने सामने खड़ी हों तब देश की रक्षा का दायित्व संभालने वाला सैनिकों के बीच रहे और शस्त्र का पूजन करे, यही समय की मांग होती है।हमें याद रखना होगा कि पिछले साल विजयादशमी के दिन ही देश के रक्षामंत्री वायुसेना के लड़ाकू पायलटों की टीम के साथ राफेल विमानों की पहली खेप लेने के लिए फ्रांस के बॉर्डेक्स गए थे। तब विजयादशमी के दिन 8 अक्टूबर को उन्होंने विदेश की घरती पर भी भारतीय परम्परा का पालन करते हुए पहले राफेल युद्धक विमान को हासिल कर उसका पूजन किया था। तब उन्होंने युद्धक विमान का पूजन कर उस पर स्वास्तिक भी अंकित किया था। भारतीय परम्परा को न जाने वाली और जानकर भी न मानने वाली सोच के लोगों के तब उसका परिहास किया था, निंदा की थी। ऐसा करके वे अपनी अज्ञानता ही प्रकट करते हैं। वस्तुतः प्राचीन काल से ही भारत में शक्ति की आराधना सात्विक शक्तियों के संरक्षण और आसुरी शक्तियों के नाश के लिए की जाती रही है।

हमारी यह परंपरा शास्त्रों के साथ शस्त्र पूजन और विधिवत शक्ति आराधना के लिए प्रेरित है। महाकवि निराला के मन और हृदय से जब ''राम की शक्‍ति पूजा'' कविता प्रस्‍फुटित हो रही होगी, तब निश्‍चित ही उन्‍हें अपनी इसी परंपरा का ही स्‍मरण रहा होगा। वस्‍तुत: मां भगवती की आराधना के नौ दिन और इन नौ दिनों में नित्य प्रति शास्‍त्रों का पठन, मां भगवती के पूजन के साथ ही उनके हाथों में विराजमान विविध शस्‍त्रों का पूजन हर सनातनी हिन्‍दू विधि-विधान से करते हैं और उसके बाद अंतिम दसवें दिन दशहरे पर अस्‍त्र-शस्त्रों का व्यापक स्‍तर पर सामूहिक पूजन करने की परंपरा हमारे समाज में सदियों से चली आ रही है। जिसके पास उसकी रक्षा के लिए जो भी शस्त्र है - छुरी, तलवार, गड़सा, धनुष-बाण, पिस्‍तौल, बंदूक या अन्‍य कुछ भी जो हमारी रक्षा करने में सहायक हो सकता है, दशहरे पर उसका पूजन करता है । साथ ही जिन घरों में विद्या अध्‍ययन की परंपरा है और जो व्‍यापार से जुड़े हैं, वे शस्‍त्रों के साथ अपने ग्रंथों व तराजू की पूरा करना नहीं भूलते।

हमारी यह प्राचीन परंपरा हमें यही सिखाती है कि जो हमें आगे बढ़ाने में सहायक हैं, वे हमारे सच्‍चे मित्र शस्‍त्र, शास्‍त्र और सामूहिक समाज की शक्‍ति है, जिसे हम देवी रूप में पूजते हैं । शस्‍त्रों की पूजा से परंपरा यह संकेत करती है कि जो शक्तिशाली है उसी के सभी मित्र हैं, कमजोर का कोई मित्र नहीं । कई उदाहरण भी हमारे सामने हैं । संभवत: यही कारण रहा कि हमारे ऋषि-मुनि अरण्‍यों में रहने के बाद भी शास्‍त्र के साथ शस्‍त्र संचालन की भी शिक्षा देते थे। उनकी परा और अपरा विद्या भी शस्‍त्र और शास्‍त्र से मुक्‍त नहीं थी। अथर्ववेद में कहा गया है- चक्षुषः मनसः ब्रह्मणः तपसः हेतिः मन्याह मेनिः । अर्थात आंख, मन, ज्ञान और तप के जो शस्त्र है वे शस्त्रों के भी शस्त्र है। कहने का तत्‍पर्य है कि पाशविक बल से कई गुना अधिक शक्तिवान आत्मिक बल होता है । ये आत्मिक बल जितने परिमाण से बढ़ेगा, उतने ही परिमाण से शत्रु के पाशविक बल घटेंगे । उदाहरण प्रत्‍यक्ष है-रावण जब पाशविक शस्त्रों से सुसज्जित होकर रथहीन राम के सामने पहुँचे तो विभीषण से श्रीराम ने कहा - जिसके रथ के पहिये शौर्य तथा धैर्य हैं , सत्य और शील ध्वजा पताका हैं , बुद्धि प्रचंड शक्ति है , श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष हैं , अचल मन तरकस है , ज्ञानी गुरु का आशीर्वाद रूप कवच है इसके समान विजय उपाय न दूजा, इसलिए ही अंत में विजय श्रीरामजी की ही होती है।

इसी तरह से ऋग्वेद में यह ऋषियों ने कहा- मायादभिरिन्दृमायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ।1।11।6। अर्थात् हे इंद्र मायावी पापी विषैले तथा जो दूसरों को चूसने वाले हैं उनको तू माया से पराजित करता है, इसमें माया पर विशेष ध्यान देना चाहिए यहां स्पष्ट लिखा गया है कि मायावी को माया से मार दो। फिर महापण्‍ड‍ित विदुर ने जो लिखा वह भी ध्‍यान देने योग्‍य है। वे कहते हैं कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम् । तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत् ॥ जो आपके साथ जैसा बर्ताव करें उसके साथ वैसा ही करिए, हिंसा करने के वालों के साथ हिंसक रूप में ही आचरण करें, इसमें कोई दोष नहीं । छल करने वालों को छल से ही मार दो । जैसे महाभारत में श्रीकृष्ण ने गदा युद्ध के अवसर पर भीम को यही मंत्रणा दी थी कि है भीम छल कपट से दुर्योधन को मारो, क्‍योंकि वह इसी योग्‍य है।

वेदों में आदेश है कि हमें प्रचंड शस्त्रों का अवश्य ही संग्रह करना चाहिए परन्तु इसके साथ ही अपराजेय चारित्रिक, मानसिक और आत्मिक बल का भी संचय करना चाहिए, जैसा अर्जुन और भगवान श्रीराम ने किया था। शक्ति आराधना के पर्व नवरात्र के पश्चात आने वाला विजयादशमी का पर्व विजयोत्सव के साथ जुड़ा हुआ है। शस्त्र-भक्ति की महिमा आसुरी ताकतों के खिलाफ दैवी शक्ति के विजय का महात्म्य दर्शाती है। शस्त्र की भक्ति हमें उसके दुरुपयोग की वृत्ति से दूर रखती है। इसी तरह से संस्कार और विवेक से ही शस्त्र के अहंकार से हम दूर रहते हैं ।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ इन भारतीय परम्पराओं और दर्शन का सबसे बड़ा वाहक है। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने सन 1925 में विजय दशमी वाले दिन ही समाज संगठन और देश को स्वतंत्र कराने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। उस समय संघ की प्रतिज्ञा लेने वाला प्रत्येक स्वयंसेवक देश को स्‍वतंत्र कराने का संकल्प लेता था। अपनी स्थापना के दिन शस्त्र पूजन की यह परम्परा संघ के स्वयंसेवक बड़े गर्व से निभाते आ रहे हैं। इस वर्ष भी संघ के वर्तमान प्रमुख डॉ. मोहन राव भागवत ने नागपुर में शस्त्र पूजन किया। संघ की शाखा में जाने वाला प्रत्येक स्वयंसेवक अपनी परंपरा में शस्‍त्र, शास्‍त्र और शक्‍तिपूजन के सही मायनों को समझता है। देश के वर्तमान रक्षामंत्री भी एक स्वयंसेवक हैं। वे इस भारतीय परम्परा को भला कैसे भुला सकते हैं।

स्‍वाधीनता मिलने के बाद संघ के स्वयंसेवकों का संकल्प बदल गया। अब संघ का हर स्वयंसेवक देश को परम शक्तिशाली बनाकर अपनी भारत माता के परमवैभवी स्वरूप में देखना चाहता है। संघ की शाखा में उसे दैवीय शक्ति और आसुरी शक्ति का भेद समझाया जाता है। उसे सिखाया जाता है कि शस्त्र का दुरुपयोग एक ओर रावण और कंस बनाता है तो दूसरी ओर इसका सदुपयोग कर राम और कृष्ण भगवान के रूप में पूजित होते हैं। उन्हीं राम-कृष्ण की धरती पर पांच हजार वर्ष से भी प्राचीन श्रेष्ठ संस्कृति और सभ्यता को बचाए रखना है तो उन्हीं की तरह शक्ति का संघान करना ही होगा। चौतरफा आसुरी शक्ति और कुसंस्कृति को परास्त करने के लिए हमें शास्त्र सम्मत ज्ञान होना ही चाहिए। पर जब आसुरी शक्ति शास्त्र सम्मत व्यवहार न करे तो भी उसे हमारी शक्ति का आभास होना चाहिए।

शस्त्र का आपके पास होना आपकी शक्ति का आभास देता है। यह विश्वास पैदा करता है कि अंतिम विकल्प के रूप में शत्रु का संहार करने में हम सक्षम है। भारत-चीन सीमा पर वर्तमान समय में जो स्थिति बनी है, उसमें चीन के कदम जिस तरह ठिठके हैं, वह सिर्फ इसलिए कि भारत आज पहले के मुकाबले कहीं अधिक शक्ति सम्पन्न है। विजयादशमी के संदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव ने इसी बात को रेखांकित किया। संघ के स्वयंसेवक रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने देश की सीमा पर शस्त्र पूजन कर देश को समर्पित सेना और सम्पूर्ण राष्ट्र को भारत की विजय का विश्वास भरा। यही है विजयादशमी वास्तविक अर्थ।

(लेखक हिन्‍दुस्‍थान समाचार से जुड़े हैं ।)

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