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खतरनाक है मौसम का बदलता मिजाज

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:17 Sep 2018 2:50 PM GMT

खतरनाक है मौसम का बदलता मिजाज

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गणेश शंकर भगवती

वल भारत अपितु सारी दुनिया में मौसम में जिस तरह का बदलाव आ रहा है यदि वैसा ही रहा तो आगे चलकर परिस्थितियां कितनी गंभीर हो सकती हैं इसकी कल्पना मात्र से ही सिहरन पैदा हो जाती हैं। यह तो पता नहीं कि आज से 5-7 हजार साल पहले मौसम कैसा हुआ करता था क्योंकि इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है परंतु इतिहास से जरूर इसके पमाण मिलते हैं कि मौसम कभी इतना खतरनाक नहीं हुआ जैसा आजकल कहीं-कहीं हो जाया करता है। हमारे पौराणिक काल में भी ऐसी घटनाओं का उल्लेख नहीं है कि जहां मौसम के कारण लोगों को उस तरह की त्रासदियों को भुगतना पड़ा हो जैसा आज नजर आता है।

वैसे अतीत में पानी न बरसने के कारण अकाल की अनेक कथाएं पौराणिक ग्रंथों में मिल जाती हैं और पलय के बारे में भी यह कल्पना है कि उसमें पृथ्वी का सारा जनजीवन जलमग्न हो जाता है परंतु इसका कोई पुख्ता पमाण मौजूद नहीं है। पिछले 100-150 वर्ष के मौसम के बारे में जो अधिकृत रिकॉर्ड दुनिया के अधिकांश देशों में उपलब्ध है उसमें पानी न बरसने के कारण सूखे के संकटों का तो उल्लेख है परंतु अब जिस तरह से पृथ्वी के एक अंचल में एक समय में एक तरफ भयंकर गर्मी पड़ रही हो और दूसरे में अधिक बरसात हो रही हो ऐसे दृष्टांत कम ही मिलते हैं। भारत के संदर्भों में माना जाता है था कि यहां ऋतुओं का कम निर्धारित है और हर मौसम समय पर आया जाया करता था।

आमतौर पर माना जाता था कि यूरोपीय देशों में अधिक ठंड पड़ती है तो अरब और अफीकी भूखंड में मौसम गर्म होने के साथ उतना ही ठंडा इसलिए होता है क्योंकि वहां रेगिस्तान इस पर पभाव डालते हैं। पिछले दिनों यह खबर आई थी कि जब भारत और चीन के साथ अन्य देशों में बारिश की झड़ी लगी थी तब ऑस्ट्रलिया में सूखे के साथ यूरोनिपयन अंचल गर्मी से बुरी तरह से त्रस्त था। इस बार अमेरिका सहित दक्षिण अमेरिका के कई देशों में अधिक गर्मी के कारण जिस तरह जंगलों में बड़े पैमाने पर आग लगी वैसा अतीत में कम ही देखने में आया। यहां समझ नहीं आता कि जब पृथ्वी अपनी धुरी पर एक नियमित कम के अनुसार घूमती हुई सूर्य की परिकमा करती है तो भारत जैसे देश में ही मौसम में इतना अंतर कैसे हो जाता है। मौसम के इस बदलाव का इस बार जैसा पमाण केरल में मिला वैसा अभी तक हमारे इतिहास में देखने में नहीं आया। समुद से सटे केरल में आमतौर पर बरसात कुछ अधिक ही होती है परंतु इस वर्ष तो इतना पानी बरसा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। इधर केरल में एक तरफ पानी से हाहाकार मचा हुआ था तो उधर दूसरी तरफ हिमालय के सटे पर्वतीय अंचलों में जिस तरह पानी बरसा उसने भी एक नया रिकॉर्ड बनाया है। उत्तराखंड और हिमाचल पदेश में तो इस बार बरसात ने जैसे कहर ही बरपा दिया और जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तराखंड, राजस्थान और कर्नाटक में भी बरसात ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। मौसम विज्ञानियों के अनुसार इस बार केरल में अधिक वर्षा का पमुख कारण यह है कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से जो बरसाती हवाएं यहां आती हैं उनका कम टूट गया। आमतौर पर माना जाता है कि पानी से भरे बादलों में जब दबाव का क्षेत्र बनता है तो वहां पानी बरसता है।

कहा जाता है कि इस बार बंगाल की खाड़ी में मौसम दबाव के जितने सिस्टम बने उनकी तुलना में अबर सागर से सिस्टम पानी लेकर नहीं आया। मध्यपदेश देश के ऐसे राज्यों में है जहां दोनों ओर से पानी आता है। यहां बंगाल की खाड़ी में बनने वाला सिस्टम पानी लेकर पूरे अंचलों में वर्षा करता है तो अरब सागर का सिस्टम पश्चिमी क्षेत्र को तरबतर करता है। हालांकि इसके अंदर यह तय नहीं है कि कोई सिस्टम किसी निर्धारित स्थान पर ही जाएगा क्योंकि किस सिस्टम की दिशा कब किस ओर मुड़ जाए इस बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। यही वजह है कि जिन इलाकें में अच्छा पानी बरस जाया करता था वे कई बार कम वर्षा की परिधि में आते हैं। ज्ञान विज्ञान ने भले ही कितनी ही पगति कर ली हो परंतु मौसम पर अभी तक कोई विजय हासिल नहीं कर सका है। वैसे यह कहा जरूर जाता है कि मौसम के बिगड़ने का मूल कारण पकृति का पाकृतिक संतुलन बिगड़ना है।

जिस तरह दुनियाभर में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है। खनन करके धरती को खोखला कर दिया है और बांध बना दिए गए हैं उससे पाकृतिक संतुलन बिगड़ा है। कारण भले ही कुछ हों परंतु आज जैसा मौसम भारत से लेकर दुनिया के लोग देख रहे हैं उससे स्पष्ट है कि पकृति के आगे आज भी ज्ञान और विज्ञान कहीं नहीं ठहरता और वह जैसा चाहेगी वैसा सहन करना ही होगा।

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