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हिन्दी दिवस

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:17 Sep 2018 3:38 PM GMT

हिन्दी दिवस

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पद्मश्री श्यामलाल चतुर्वेदी

हिन्दी राष्ट्रभाषा हो ऐसा चाहने वालों का दर्दे दिल दिवस, साथ में कार्यालयों के कामों में हिन्दी को कितना अपनाया जा सका है, उसका लेखा-जोखा करने और आगे की कार्ययोजना के संकल्प का सुदिन।

हिन्दी के जन्म, उसकी आवश्यकता और वस्तुस्थिति। इन पश्नों की ओर आइये एक नजर डाल लेते हैं।

14 सितम्बर 1949 को संविधान निर्मात्री परिषद ने भाषा नीति पर निर्णय लेते हुए कहा था कि राष्ट्रभाषा हिन्दी होगी, लेकिन हिन्दी की तरक्की के 15 वर्षों तक पयास के चलते अंग्रेजी सहभाषा रहेगी।

इस पर उसी समय सेठ गोविन्ददास तथा अन्य अनेक राष्ट्रभक्प नेताओं ने सख्त एतराज किया था। कतिपय अत्यंत पभावी नेताओं की नियत पर उसी समय संदेह होने लगा था। 15 वर्षों का यह पुछल्ला बहकाने की बात है ऐसा आभास तभी होने लगा था। सेठ गोविंददास जी ने तो राष्ट्रभाषा हिन्दी के मार्ग में अवरोध पैदा करने वाले इस पस्ताव के विरोध में संसद और संसद के बाहर अनेक स्थानों पर कहा था- सौभाग्य की बात है कि हमारे देश के पं. जवाहरलाल नेहरू सहृश नेता हैं। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि पंडितजी हर विषय में जो कुछ सोचते हैं और करते हैं, वह सब ठीक है। सेठ जी ने व्यथित होकर कहा था कि जिस व्यक्पि ने हिन्दी की पाथमिक परीक्षा पास न की हो और आज भी बैठे तो फेल हो जावें, उनका हिन्दी के संबंध में विचार अनाधिकार चेष्ठा है।

पस्ताव का पास होना हिन्दी के हिमायत करने वाले देशभक्पों पर गहरा आघात था। इस बीच कुछ दिखावे के, कुछ कामों के साथ अंग्रेजी को बढ़ावा देने के पभावी पयास पयत्नपूर्वक किये जाते रहे। हिन्दी का हित दूसरे दर्जे का काम होता गया। सन् 1965 के करीब 2 वर्ष पूर्व, पधानमंत्री ने कह दिया कि सन् 1965 के बाद भी अनिश्चितकाल तक, जब तक कि अहिन्दी भाषा अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे, वह हिन्दी के साथ चलेगी। सेठ गोविंददास ने स्पष्ट मत पगट किया था कि पधानमंत्री जी का हिन्दी के पति जो रुख है, उसका हमें डटकर विरोध करना है। तानाशाही में ही तानाशाह के हर विचार और कृति का अनुमोदन हो सकता है, पजातंत्र में कदापि नहीं।

जब हिन्दी भक्प निराश होने लगें और 17 अगस्त, 1964 को उत्तरपदेश की विधानसभा ने अंग्रेजी को अनिश्चितकाल तक चलाने का पस्ताव पास कर दिया, तब हिन्दी साहित्य सम्मेलन पयाग के पदाधिकारियों ने सार्वजनिक सभा करके विरोध करने का निश्चय किया और 22 अगस्त 1964 को सार्वजनिक सभा बुलाई गई थी। श्री बालकृष्ण राव की अध्यक्षता में सम्पन्न सभा में कांग्रेस, समाजवादी, जनसंघ आदि राजनैतिक दलों के अलावा भारतीय हिन्दी परिषद, परिमल, हिन्दुस्तानी अकादमी, संस्कृत पचार परिषद जैसी अनेक संस्थाओं के पतिनिधि भी सम्मिलित हुए और अनेक पस्तावों को पास किया। संघर्ष समिति बनाने की घोषणा की गई और तय किया गया कि उत्तरपदेश विधानसभा में पारित हिन्दी विरोधी भाषा विधेयक के विरोध में 8 से 14 सितम्बर तक पूरे सप्ताह को हिन्दी सप्ताह के रूप में मनाया जावे। आंदोलन में सातों दिन सभा करने, पत्रक वितरण, शिष्टमंडल राजधानी लखनऊ भेजने के साथ पचार समिति, जनसम्पर्प समिति, जुलूस तथा सार्वजनिक सभा समिति की घोषणा की गई। समितियों में सर्वश्री कृष्णादास अमृतराय, उपेन्दनाथ अश्क, मुरली मनोहर जोशी, मेंहदी इलाहाबादी, सरदार बलवंतसिंह, महमूद अहमद हुनर, महादेवी वर्मा, राजेन्दकुमारी वाजपेयी, पुरुषोत्तम दास टण्डन आदि थे।

निर्धारित कार्यकम के अनुसार सप्ताह भर आयोजन हुए। मुख्यमंत्री श्रीमती सुचेता कृपलानी से शिष्टमंडल मिला। 8 से 14 सितम्बर तक हिन्दी सप्ताह मनाने का निश्चय किया गया। 14 सितम्बर 64 को श्री अमृतलाल नागर की अध्यक्षता में संपन्न सार्वजनिक सभा में सामूहिक पतिज्ञा की गई कि जब तक हिन्दी को उसका पूर्णरूपेण पद नहीं मिलेगा, तब तक संघर्ष करते रहेंगे। हिन्दी दिवस उसी हिन्दी सप्ताह का संक्षिप्त संस्करण है।

यह तो हिन्दी दिवस के आयोजन का इतिहास है। इतने वर्ष हो गये किन्तु हिन्दी राष्ट्रभाषा का पश्न कमोबेश कायम है।

पत्येक राष्ट्र की उसकी अपनी भाषा होती है किन्तु हमारा देश ऐसा हत भाग्य है, जिसकी राष्ट्रभाषा का पश्न अभी भी अनसुलझा है, बल्कि स्वतंत्रता के पूर्व की स्थिति से अंग्रेजी का उससे अधिक वर्चस्व बढ़ा है। दिनों दिन और बढ़ोतरी हो रही है। यह स्थिति राष्ट्र की अस्मिता के लिए लज्जास्पद है।

स्वतंत्रता संग्राम की बलि वेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों की भाषायी आकांक्षा आज भी अधूरी है। आइये, हम उन महापुरुषों के राष्ट्रभाषा संबंधी उद्गारों से वाकिफ हो लें।

राष्ट्रपिता विश्व वन्दनीय महात्मा गांधी ने 5 जुलाई 1928 के अपने अखबार `यंग इंडिया' में लिखा था- `मैं यदि तानाशाह होता तो आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा का दिया जाना बन्द कर देता। सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएं अपनाने को मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते उन्हें बर्खास्त कर देता। मैं पाठ्यपुस्तकों के तैयार किये जाने का इंतजार न करता।'

श्री बालकृष्ण राव का मानना था कि गांधीजी के मन में कहीं यह आकांक्षा छिपी थी कि देश के स्वतंत्र होने के बाद भी शायद राष्ट्रीय स्वाभिमान सच्चे अर्थ में जागृत न हो पावे। तभी तो उन्होंने तानाशाह की शक्पि को आवश्यक समझा था।

भारतेन्दु हरिश्चन्द ने तो बहुत पहले कहा था कि -

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन मित्र भाषा ज्ञान के, मिटय न हिय को शूल।।

लार्ड मेकाले ने 1813 में कहा था - अगर इस देश में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बन गई तो आगामी 30 वर्षों के भीतर इस देश की मिट्टी, इसके पानी, इसकी जातीय परम्परा और संस्कृति से पेम करने वाला कोई न रह जायेगा। इसी मेकाले ने सन् 1835 में यह फतवा दिया कि रूंची श्रेणी के भारतीयों को अंग्रेजी में शिक्षा देकर उसका एक ऐसा वर्ग बनाना चाहिए जो रंग और खून से तो हिन्दुस्तानी हो पर रुचि, मतों, शब्दों और बुद्धि से अंग्रेज हों।

नेताजी सुभाष का मत था- हिन्दी के विरोध में कोई भी आंदोलन राष्ट्र की पगति में बाधक है। उससे राष्ट्र कमजोर बनेगा। स्वामी दयानंद सरस्वती ने तो वेद शास्त्राsं को अभारतीय भाषाओं में अनुवाद करने की पार्थना को ठुकरा दिया था। उनका स्पष्ट ख्याल था- हिन्दी के द्वारा ही सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।

अपनी मान्यता के पक्के मोरार जी देसाई का विचार था- जब तक इस देश का राजकाज अपनी भाषा से नहीं चलेगा, तब तक हम यह नहीं कह सकते हैं कि देश में स्वराज्य है।

लाला लाजपतराय के विचार थे- मैं उर्दू जानता था। फारसी पढ़ने में कई साल मैंने लगाये। हिन्दी अक्षर तक नहीं जानता था परंतु जीवन से ही मुझे यह निश्चय हो गया कि राजनीतिक एकता के लिए सारे देश में हिन्दी और नागरी का पचार आवश्यक है।

महामना मदनमोहन मालवीय -विदेशी भाषा का ज्ञान मात्र पाप्त करने में जितना समय हमारे युवकों को लगाना पड़ता है, उतने ही समय में अपनी भाषा के जरिये उन्हें बहुत से विषयों का बहुत रूंचा ज्ञान पाप्त हो सकता है।

लोकमान्य तिलक - एक विदेशी भाषा का अध्ययन जबरदस्ती किसी के सिर पर मढ़ा जाना भारत को छोड़कर और संसार के किसी भी देश में देखने में नहीं आता। जिस शिक्षा को हम अपनी मातृभाषा के द्वारा 7 या 8 वर्ष में पाप्त कर सकते हैं, उसी के लिए हमें 25 या 26 वर्ष लगा देने पड़ते हैं। अंग्रेजी हम चाहेंगे तो सीख लेंगे पर वह अनिवार्य क्यों की जावे? मुसलमानों के शासनकाल में फारसी पढ़ते थे किन्तु हमें फारसी पढ़ने को मजबूर नहीं किया जाता था।

देशरत्न डॉ. राजेन्द पसाद - जिस देश की अपनी कोई भाषा न हो, वह देश कभी स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता। देश के विभिन्न पांतों की विभिन्न भाषाएं समृद्ध हैं किन्तु समस्त देश को एक सूत्र में गुंथित करने के लिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मानना जरूरी है अन्यथा देश की एकता खतरे में पड़ जायेगी। कांग्रेस ने सदा स्वतंत्रता पाप्ति के पश्चात् हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानने का निर्णय लिया किन्तु दुख की बात है कि भाषायी विवाद खड़ा किया जा रहा है। मेरा स्पष्ट मत है कि हिन्दी से सभी भाषाएं समृद्ध होंगी। अतः अविलम्ब हिन्दी को राष्ट्रभाषा स्वीकार किया जाना चाहिए।

रवीन्दनाथ ठाकुर - अंग्रेजी हमारे मन पर बोझ है, जिसे उतारना है। हम लोग अंग्रेजी भाषा द्वारा सिखलाये जाते हैं। इससे हमारे जीवन का सर्वोत्कृष्ट अंश बहुत कुछ नष्ट हो जाता है। यह शिक्षा हमारे जीवन के अनुकूल नहीं होती। हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जो समस्त देश की एकता रखेगी।

डॉ. राममनोहर लोहिया कहते थे- हिन्दी में सात लाख शब्द हैं, जबकि अंग्रेजी में ढाई लाख के आसपास। इसके अलावा अंग्रेजी की शब्द गढ़ने की शक्पि नष्ट हो चुकी है, जबकि हिन्दी की अभी जवानी ही नहीं चढ़ी। संसार की सबसे धनी भाषा हिन्दी है। भारतमाता आजाद जरूर हुईं, लेकिन इसकी जीभ कटी हुई है। इसकी जीभ को जोड़ो। एक बार भारतमाता की जीभ जुड़ जायेगी, तब उस जीभ से सरल शब्द निकलेंगे या क्लिष्ट, सरस या भोंड़े, इसका काल निर्णय करेगा। अंग्रेजी हटाओ इस बगावत का मूल मंत्र है। स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ पर धूमधाम से समारोह किये गये। संसद के विशेष अधिवेशन में 65 घंटे तक बहसबाजी हुई किन्तु कुल जुमला परिणाम मूलक क्या रहा? उपलब्धियों और खामियों का खाका खींचा गया किन्तु राष्ट्रभाषा के पश्न को ओझल किया गया। तुष्टिकरण की व्यामोह में किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने की बजाय उत्कृष्ट राष्ट्रभक्पि का शब्द जाल बुना जाता रहा। हिन्दी में बोल सकने वाले कई वक्ता, धारापवाह भाषण देने की कला पदर्शन की चाह में या कहें कि भाषा-भक्पि की कमी के कारण गुलाम बनाने वालों की भाषा में बोलकर अपनी असलियत दिखाते रहे। लज्जास्पद पदर्शन होता रहा।

क्या हिन्दी दिवस पर दूसरों पर दोषारोपण छोड़कर हम आप अपनी दिनचर्या में इसे कितना अपना सकते हैं, इस पर विचार कर कुछ निश्चय करना पसंद करेंगे?

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