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चुनाव पचार के नाम पर तमाशा क्यों

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:2018-09-28 17:29:26.0

चुनाव पचार के नाम पर तमाशा क्यों

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गणेश शंकर भगवती - विनायक फीचर्स

भारत में चुनाव पचार एक तमाशे का दूसरा नाम है। चुनाव पचार के नाम पर जिस तरह का तामझाम पदर्शित किया जाता है, उसे देखकर कौन कह सकता है कि भारत संसार के दरिदतम देशों में से एक है। जिस देश की आधी से अधिक आबादी फटेहाल है, उस देश में चुनाव पचार के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है।

राजनीतिक पार्टियें के पास कोई खास मुद्दा नहीं होता, जिससे जनता को आकर्षित किया जा सके, न ही उनके पास ठोस रचनात्मक कार्यकम ही होते हैं। अधिकांश राजनीतिक पार्टियां ऐसे सत्तालोलुप व्यक्तियों का समूह होती हैं, जो किसी भी कीमत पर सत्ता का स्वाद पाप्त करना चाहते हैं। ऐसे लोगों में असामाजिक तत्वों की तादाद ज्यादा होती है। पायः इनकी आपराधिक पृष्ठभूमि होती है। अवैध तरीके से जुटाए गए अनाप-शनाप रुपए लेकर ये लोग चुनाव में अपनी जीत को खरीदना चाहते हैं। यही कारण है कि चुनाव पचार के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाडक्व करते हुए वे तनिक भी नहीं हिचकते।

वर्तमान समय में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के क्षेत्र में जो कांति हुई है, चुनाव पचार में उसका भरपूर फायदा उठाया जाता है। पेशेवर पचार विशेषज्ञों को राजनीतिक पार्टियां पचार कार्य की जिम्मेदारी सौंपती है और बदले में मुंहमांगी रकम देती हैं। ये पचार विशेषज्ञ उत्पादों को पचारित करने की तरह राजनीतिक पार्टियों को पचारित करते हैं। नेताओं की लुभावनी तस्वीरें आकर्षक झूठे नारे एवं खोखले वादे पचारित करने के लिए दृश्य-श्रव्य माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है। पैरोडी कैसेट बनाए जाते हैं, जिनमें लोकपिय फिल्मी गानों की तर्ज पर गाने बनाए जाते हैं। इन गानों में विरोधी पार्टियों को गाली दी जाती है और अपनी पार्टी का गुणगान किया जाता है। इसी तरह वीडियो फिल्में बनाई जाती हैं। चुनाव पचार के लिए फिल्मी सितारों, खिलाडिक्वयों आदि हस्तियों का भी इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे लोगों का इस्तेमाल भीडक्व को आकर्षित करने के लिए किया जाता है। चुनाव पचार के समय अचानक राजनेता उदार हो जाते हैं और दरियादिली का पदर्शन करते हुए वे अपने क्षेत्र की गरीब जनता की दुर्दशा देखकर आंसू बहाने लगते हैं। वे गरीबों को कंबल बांटते हैं। कहीं स्कूल बनाने के लिए पैसे देते है। उनकी उदारता का स्वरूप देखकर ऐसा लगता है कि मानो जनता के सच्चे हमदर्द वे ही हैं परंतु सच्चे अर्थों में यह सब महज दिखावा होता है। पिछले चुनावों के अनुभव से सिद्ध हो चुका है कि मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए ही इतना सारा पाखंड रचाया जाता है। चुनाव जीतकर सत्ता सुख पाने के उद्देश्य से ही राजनेता अचानक इतने उदार बन जाते हैं। उनकी उदारता देखकर मतदाता काफी पभावित होते हैं और अपना कीमती वोट उन्हें देकर विजयी बना देते हैं। इसके बाद राजनेता गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। सत्ता सुख पाते ही वे मतदाता को पूरी तरह भूल जाते हैं एवं सारा ध्यान अपने स्वार्थों को सिद्ध करने में लगाते हैं।

चुनाव पचार के समय राजनीतिक पार्टियां व्यवसायियों, पूंजीपतियों, कालाबाजारियों से चंदे के रूप में काफी धन इकट्ठा करती हैं। इसवे अलावा भ्रष्ट नेताओं के पास अपनी अवैध कमाई तो होती ही है। सत्ता में काबिज रहते समय घोटालों के जरिए राजकोष से हडक्वपी गई राशि होती है। चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए काली कमाई का इस्तेमाल जी खोलकर किया जाता है। चुनाव क्षेत्रों में महंगे उपहार वितरित किए जाते हैं। गुंडों को विशेषरूप से उपकृत किया जाता है, ताकि बाहुबल के सहारे चुनाव में जीत सुनिश्चित हो सके। जैसे मूल्यों को ताक पर रख राजनीतिक पार्टियां चुनाव पचार को तमाशे को रूप देकर जनमानस के विश्वास के साथ छल कर रही है। (विनायक फीचर्स)

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