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उथल-पुथल के बीच सियासत में लौटे सकारात्मक मुद्दे

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:24 Dec 2018 4:17 PM GMT

उथल-पुथल के बीच सियासत में लौटे सकारात्मक मुद्दे

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वरिष्" पत्रकार सागरिका घोष हाल के विधानसभा चुनावों को कवर कर रही थीं तो उन्हें, मध्य फ्रदेश के विदिशा चुनाव क्षेत्र, जो बीजेपी का गढ़ माना जाता है क्योंकि पिछले 46 वर्ष के दौरान इस पार्टी ने यहां कोई छोटा या बड़ा चुनाव नहीं हारा, में आरएसएस के एक सदस्य से भेंट हुई। इस शख्स का नोटबंदी व जीएसटी के कारण व्यापार पूर्णतः चौपट हो गया है इसलिए उसने उन्हें बताया कि वह होने जा रहे विधानसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में मतदान करेगा। पता नहीं उसने विरोध में किया पक्ष में लेकिन जब 11 दिसम्बर 2018 को पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आये तो बीजेपी विदिशा ही नहीं मध्य फ्रदेश व छतीसगढ़ भी हार गई, जहां वह पिछले 15 वर्ष से राज कर रही थी।

हालांकि नोटबंदी व जीएसटी इस साल की बातें नहीं हैं, लेकिन मध्यम वर्ग का व्यापारी अब इनके फ्रभावों को शिद्दत से महसूस करने लगा है, विशेषकर निरंतर बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई, जिसमें पेट्रोल व डीजल के दाम भी शामिल हैं। साथ ही किसानों को अपनी लागत का मूल्य भी वापस न मिल पाना भी बड़ी समस्या है। इसलिए सागरिका घोष जहां जहां गईं वहां सिर्फ यही सुनने को मिला कि `बच्चे की स्कूल फीस देनी है और रोजगार की स्थिति बेहतर नहीं है'। इन समस्याओं के `समाधान' के रूप में सत्ता पक्ष ने भावनात्मक बातें- राम मंदिर, शहरों का नाम बदलना (इलाहाबाद को फ्रयागराज करना), गाय को राष्ट्रीय माता घोषित किया जाये, हनुमान जी की जाति, तीन तलाक पर अध्यादेश आदि- परोसने का फ्रयास किया। लेकिन जनता भूख में भजन भूल गई। नतीजतन कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, मिजोरम में भी मध्य फ्रदेश व छतीसगढ़ की तरह बीजेपी सत्ता में न आ सकी, जबकि 2017 तक वह लगभग हर विधानसभा चुनाव विकास व सकारात्मक परिवर्तन के नाम पर जीत रही थी।

ऐसे में कहा जा सकता है कि साल 2018 का बड़ा राजनीतिक सबक यह है कि जनता अब भावनाओं में बहकर नहीं बल्कि सोच समझकर मतदान करने लगी है कि जो उसकी मूलभूत समस्याओं के समाधान का फ्रयास करेगा, वह उस राजनीतिक दल के पक्ष में खड़ी नजर आयेगी, जैसा कि तेलंगाना में देखने को मिला। 64 वर्षीय कलवाकुंतला चंद्रशेखर राव ने किसानों व अन्य कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए जो सकारात्मक नीतियां अपनाई, उन्हीं के कारण उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्रीय समीति को 119 में से 88 सीटें फ्राप्त हुईं, जो उनके पिछले फ्रदर्शन से भी बेहतर है। जनता ने धर्म की राजनीति को अवश्य नकारा है, लेकिन यही बात जाति आधारित राजनीति के बारे में नहीं कही जा सकती।

इसी साल 20 मार्च को सुफ्रीम कोर्ट की दो सदस्यों की खंडपी" ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में आदेश दिया कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत जांच में साक्ष्य मिलने पर ही गिरफ्तारी की जा सकती है, केवल शिकायत करने पर गिरफ्तारी नहीं होगी। इस पर दलित राजनीति में उबाल आ गया और 2 अफ्रैल 2018 को देशव्यापी बंद का आयोजन किया गया, जिसमें आगजनी व हिंसा हुई। दलित मतों के महत्व को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अध्यादेश के जरिये उक्त कानून को पुरानी स्थिति में बहाल कर दिया। जहां तक जम्मू कश्मीर की बात है तो वहां स्थिति हमेशा की तरह आशा व निराशा के बीच झूलती रही। पीडीपी व बीजेपी का ग"बंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लागू है, जिसे संभालने के लिए सत्यपाल मलिक के रूप में नये राज्यपाल की नियुक्ति की गई। उन्होंने स्थिति को बेहतर करने के फ्रयास में स्थानीय निकायों के चुनाव अक्टूबर व नवम्बर में कराये, लेकिन कोई विशेष फायदा न हो सका क्योंकि राज्य की दोनों मुख्य पार्टियों- पीडीपी व नेशनल कांफ्रेंस- ने इनका बायकाट किया, बहुत से चुनाव क्षेत्रों में तो फ्रत्याशी ही नहीं थे।

फिर केंद्र सरकार की तरफ से सज्जाद लोन को मुख्यमंत्री बनाने का फ्रयास किया गया, जिसके जवाब में पीडीपी व नेशनल कांफ्रेंस ने संयुक्त रूप से सरकार बनाने की दावेदारी पेश की। इस पर जबरदस्त विवाद हुआ और मलिक ने विधानसभा को ही भंग कर दिया। अब संभवतः मार्च 2019 में नई विधानसभा के लिए चुनाव होंगे। बहरहाल, इस साल किसानों के अलावा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बेरोजगारी का रहा, खासकर जब इसके समाधान के रूप में पकौड़े बेचने का विकल्प रखा गया। बेरोजगारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेलवे में जब 90,000 रिक्त स्थानों के लिए अर्जी मांगी गई तो ढाई करोड़ से अधिक आवेदन आये और राजस्थान में चपरासी की नौकरी के लिए इंजीनियर व एमबीए स्नातकों ने आवेदन किया, और नौकरी मिली एक विधायक के बेटे को। राजनीति में पक्ष विपक्ष द्वारा एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना तो रूटीन हो गया है और इस साल भी इसकी कोई कमी नहीं रही। लेकिन इस वर्ष जो अफ्रत्याशित हुआ वह यह था कि देश की अनेक संस्थाएं, जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं, विवादों के घेरे में रहीं।

इस साल सुफ्रीम कोर्ट के चार वरिष्" न्यायाधीशों ने असामान्य फ्रेस कांफ्रेंस की जिसमें उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाये। फिर सीबीआई के दो वरिष्" अधिकारियों के बीच विवाद इतना गहराया कि मामला सुफ्रीम कोर्ट तक पहुंचा। ...और साल का अंत आते-आते सरकार व आरबीआई के बीच कुछ मुद्दों को लेकर इतनी खींचतान हुई कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा, जिसका कारण उन्होंने `व्यक्तिगत' बताया। लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वीकार किया कि दो-तीन मुद्दों (ाढsडिट फ्लो, लिक्विडिटी सपोर्ट) को लेकर सरकार व आरबीआई में मतभेद था।

बहरहाल, बड़ा विवाद सीबीआई को लेकर रहा। सीबीआई (केन्द्राrय जांच ब्यूरो) के 55 वर्ष लम्बे इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि उसके निदेशक को उसकी कार्यावधि के दौरान ही जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया। निदेशक अलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना, जो पिछले एक साल से आपस में ही लड़ रहे थे, के अधिकारों व जिम्मेदारियों को छीन लिया गया, सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) की रिपोर्ट के आधार पर।

इन दोनों की आपसी उ"ापटक के चलते हो यह रहा था कि अस्थाना ने अनेक अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए वर्मा के खिलाफ शिकायत दर्ज की और जवाब में वर्मा ने अस्थाना के विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज की। फलस्वरूप सरकार ने इन दोनों को बेंच करते हुए 14 अन्य अधिकारियों को इधर-उधर हस्तांतरित कर दिया गया।

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