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लिव इन रिलेशनशिप को मिले कानूनी मान्यता

👤 Veer Arjun Desk | Updated on:2018-06-17 17:32:11.0

लिव इन रिलेशनशिप को मिले  कानूनी मान्यता

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नम्रता नदीम

महिलाओं के विरूद्ध हाल के सालों में जो अपराध बढ़े हैं, उनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लिव इन रिलेशनशिप की भी अपनी बड़ी भूमिका है। साल 2016 में हिंदुस्तान में जितनी महिलाओं ने आत्महत्या की, उनमें तकरीबन 2 फीसदी महिलाएं ऐसी थीं, जिन्होंने लिव इन रिलेशनशिप में रहने के चलते खाये धोखे के कारण अपनी इहलीला समाप्त कर ली थी। दरअसल उन्होंने लिव इन रिलेशनशिप में रहते हुए एक मोड़ पर अपने को "गा हुआ महसूस किया और इससे इस कदर टूटीं कि मौत को गले लगा लिया।

कहने और सुनने में तो लिव इन रिलेशनशिप एक बेहद आधुनिक और प्रगतिशील संबंध है। अकसर हम बहस के दौरान इसे ऐसा ही साबित करने कोशिश भी करते हैं, इसी तर्क से इसके पक्ष में होते हैं। लेकिन यह बातों और विचारों में जितना आधुनिक और प्रगतिशील संबंध दिखायी पड़ता है, उतना है नहीं। आपको हर दिन किसी अनीता, सुनीता, रंजना, मंजू और अंकिता की कहानी पढ़ने को मिल जायेगी जिसमें वही सब होगा जो रिचा और सोमेश की कहानी में मौजूद है। रिचा कानपुर की थी और सोमेश लखनऊ का। 4 साल पहले दोनो तकरीबन एक ही समय मुंबई आये थे, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने नहीं बल्कि दोनो सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे और अपनी-अपनी कंपनियों के मुंबई स्थित यूनिट में उनका तबादला किया गया था।

दोनो की कंपनियां आसपास थीं इस कारण लंच के दौरान बाहर या शाम को उनकी अकसर मुलाकात हो जाती थी। खासकर इसलिए भी क्योंकि रिचा और सोमेश दोनो एक ही चार्टेड बस से अपनी-अपनी ड्यूटी आते-जाते थे। बहरहाल इस कहानी में पहले जान-पहचान हुई, फिर दोस्ती और अंत में दोनो लिव इन रिलेशनशिप के तहत पति पत्नी के रूप में एक साथ रहने लगे। जैसा कि तमाम कहानियों में होता है, रिचा और सोमेश की कहानी में भी आगे चलकर वही हुआ। हर गुजरते दिन के साथ रिचा की भावनाएं सोमेश के लिए गहरी से गहरी होती गईं और सोमेश का हर दिन गुजरने के साथ ही दिल भरने लगा।

अंत में वही हुआ, सोमेश ने दोस्ती तोड़ने का संकेत दिया तो रिचा बिफर पड़ी; क्योंकि सोमेश तब तक उसका तीन बार एर्बोशन करा चुका था। वह सोच भी नहीं सकती थी कि अब वह किसी और के साथ शादी कर सकती है। कहानी का अंत कई दूसरी कहानियों की तरह ही दुखद रहा। सोमेश अंततः रिचा को डिच कर गया, उसने अपना तबादला बंग्लुरु करा लिया, जिस कारण रिचा बहुत टूट गईं और अंततः उसने आत्महत्या कर ली।

लेकिन यह कहानी किसी एक रिचा या सोमेश की नहीं है। ाढाइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक 57 फीसदी लिव इन रिलेशनशिप की यही परिणिति होती है। सवाल है ऐसे क्यों हो रहा है? इसे कैसे रोका जाये? उपदेशों से बात नहीं बनेंगी कि लड़कियों को लड़कों पर भरोसा नहीं करना चाहिए या इस तरह के संबंध जिनकी सामाजिक मान्यता न हो, उन्हें अमल में नहीं लाया जाना चाहिए। ये बहुत पुरानी बातें हैं और बहुत बार कही जा चुकी हैं। लेकिन समस्या का कोई समाधान इन बातों से नहीं निकल रहा।

इसलिए वक्त आ गया है कि लिव इन रिलेशनशिप को पूरी तरह से कानूनी जामा पहना दिया जाये। गो कि हिंदुस्तानी समाज में तमाम सामाजिक संबंधों की मान्यता समाज से मिलती है, कानून से नहीं। कानून से जिन संबंधों को कानूनी मान्यता मिलती भी है, अगर उन संबंधों को भी समाज से मान्यता नहीं मिले तो वे अर्थहीन होते हैं। इसलिए लिव इन रिलेशनशिप के संबंध में दोहरे स्तर पर काम किये जाने की जरूरत है। एक तो इसे मजबूत कानूनी जामा पहनाया जाये ताकि लिव इन रिलेशनशिप रिश्तों में प्रयोगों की कहानी बनकर न रह जाये। दूसरी तरफ इन रिश्तों के लिए एक सामाजिक आंदोलन की भी जरूरत है, जिससे कि इन्हें आसानी से सामाजिक मान्यता मिल जाये।

बहुत सारे आदिवासी समाजों में पहले से ही ऐसे रिश्तों की मान्यता है। अगर हमें लगता है कि हम मूल समाजों से बहुत चीजें सीख सकते हैं तो क्यों न इस रिश्ते के संबंध में नागा, मिजो और खासी जैसे मूल समाजों से कुछ सीखना चाहिए, जहां लड़के और लड़कियों के वयस्क होने पर मां-बाप खुद उन्हें लिव इन रिलेशनशिप के लिए प्रोत्साहित करते हैं और इसके लिए उन्हें बकायदा अलग से रहने के लिए घर भी उपलब्ध कराते हैं।

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