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सशक्त सेना-सुरक्षित भारत

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:9 April 2019 3:40 PM GMT
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अविनाश राय खन्ना

भारतीय सेना समूचे विश्व की दूसरी बड़ी सेना है और भारतीय सेना का वार्षिक खर्च समूचे विश्व में उसे पांचवां स्थान प्रदान करता है। वर्ष 2018 में भारतीय सेना का बजट शिक्षा और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के बजट का 5 गुना था, फिर भी पाकिस्तान और चीन के साथ लगती सीमाओं पर आए दिन तनाव के दृष्टिगत रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बजट और अधिक होना चाहिए। लगभग 3 लाख करोड़ रुपए प्रतिवर्ष सेवा निवृत्त सैनिकों को पेंशन वितरित की जाती है।

अब तक भारतीय सेना के लिए रक्षा उपकरण बहुतायत विदेशों से आयात किए जाते थे, परन्तु अब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के 'मेक इन इंडिया' आह्वान के कारण भारत में कई प्रकार के रक्षा उपकरणों के निर्माण प्रारंभ कर दिए गए हैं जिससे निकट भविष्य में भारत रक्षा उपकरणों का निर्यातक देश बनने की अवस्था में आ सकता है। मॉरीशस, श्रीलंका, वियतनाम तथा संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों के साथ तो रक्षा उपकरण निर्यात के अनुबंध भी हो चुके हैं। श्री नरेंद्र मोदी ने रक्षा उपकरणों के निर्माण में भारत तथा भारत के बाहर से निजी निवेशकों को आमंत्रित करके भारत में भारी पैमाने पर बड़े-बड़े रक्षा उपकरणों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिखाया है। भारत के अंदर रक्षा उपकरणों के निर्माण से रक्षा उपकरणों के आयात की अपेक्षा लागत भी कम आएगी और भ्रष्टाचार भी समाप्त होगा।

हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के अमे"ाr जिले में एके-203 लाइफल के निर्माण करने वाली एक बहुत बड़ी फैक्ट्री का भी शिलान्यास किया है जो भारत और रूस के सहयोग से संचालित होगी। यह राइफल एके-47 से भी अधिक प्रभावशाली है जो एक मिनट में 600 गोलियां छोड़ सकती है। इसकी मारक क्षमता 400 मीटर की है जो रेत, मिट्टी और पानी में भी बराबर रहेगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सेना के तीनों अंगों, रक्षा विभाग के शोध संस्थान (डीआरडीओ) तथा अन्य रक्षा संस्थाओं को स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकतम अवसर दिए हैं जिसके परिणामस्वरूप आज भारतीय सेनाएं साधनों और उत्साह से परिपूर्ण दिखाई दे रही हैं और रक्षा उपकरणों में नित नए आयाम जुड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के प्रयासों से भारतीय सेना अब आत्मावलंबी होने की दिशा में अग्रसर है। सेनाओं को सुरक्षित और उत्साहित करने के बाद जब सेना के सामने सीमाओं पर मोर्चाबंदी और सीधी कार्यवाही के अवसर उपस्थित होने पर नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें सीमा की परिस्थितियों को देखते हुए स्वतः निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी है। जबकि इससे पूर्व सैनिक कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए राजनीतिक निर्णयों की लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।

भारतीय सेनाएं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कार्यशैली और उनके भावनात्मक नेतृत्व से अत्यंत उत्साहित दिखाई देती है। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद श्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिवर्ष दीपावली के अवसर पर भिन्न-भिन्न सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति से भारतीय सैनिकों को उत्साहित करने का महान प्रयास किया है। प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद श्री नरेंद्र मोदी ने सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए 'एक रैंक एक पेंशन' योजना प्रारंभ कर दिखाई है जिसे अनेकों पूर्ववर्ती सरकारें निर्दयता पूर्वक अस्वीकार करती रहीं। भारतीय सेनाएं निःसंदेह किसी राजनीतिक दल से संबंधित नहीं हैं। उनके ऊपर केवल देश की रक्षा का दायित्व होता है। फिर भी भारतीय सेनाएं नरेंद्र मोदी को उनके उपरोक्त सभी राजनैतिक गुणों के कारण पसंद करती हैं।

भारत की सीमाएंöभारत की 14818 किलोमीटर की सीमाएं 6 देशों के साथ लगती हैंöपाकिस्तान (3323 किलोमीटर), चीन (3488 किलोमीटर), नेपाल (1751 किलोमीटर), भूटान (699 किलोमीटर), बंगलादेश (4096 किलोमीटर) और म्यांमार (1643 किलोमीटर)। इन सभी देशों के साथ एक तरफ नशा, पशु, मानव, जाली मुद्रा तथा कीमती कलाकृतियों की तस्करी एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है तो दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर विशेष रूप से सैन्य तनाव लगातार बना रहता है। इसके अतिरिक्त लगभग 7516 किलोमीटर की सीमाएं समुद्री तटों के रूप में हैं। इन परिस्थितियों में भारतीय सेनाओं को किसी भी प्रकार के सैन्य कार्यवाही के लिए स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण बल और उत्साह सिद्ध हुआ है। वैसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारत के सभी पड़ोसी देशों को भिन्न-भिन्न प्रकार से भारतीय सहायता प्रदान करके अच्छे संबंध बनाने के सफल प्रयास किए हैं।

आंतरिक सुरक्षा में सेनाओं की भूमिकाöजम्मू कश्मीर प्रान्त में भारतीय सेनाओं को सीमाओं के साथ-साथ कश्मीरी जेहादियों के विरुद्ध भी मोर्चा संभालना पड़ता है। जब प्रांतीय सरकार सेनाओं के मार्ग में बाधा बनने लगती है तो सेनाओं का उत्साह कमजोर होने लगता है। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होते ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक दल भाजपा और पीडीपी सरकार को गिराकर राष्ट्रपति शासन लगाने में कोई विलंब नहीं किया। उनके इस साहसिक राजनीतिक निर्णय से भी सेनाओं के मनोबल में विशेष वृद्धि देखी गई। राष्ट्रपति शासन के बावजूद जब जैश-ए-मोहम्मद के एक जेहादी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 44 जवानों पर हमला किया तो भारतीय सेना ने इसका बदला लेते हुए पाकिस्तान की सीमाओं में संचालित आतंकवादियों के तीन कैंप नष्ट कर दिए। यह केवल केंद्र सरकार द्वारा सेनाओं को परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने और कार्यवाही करने की स्वतंत्रता का ही परिणाम था। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने विदेशी दौरों और मेलजोल के आधार पर चलाए गए भारत मित्रता अभियान के फलस्वरूप सारा विश्व एकजुट भारत के समर्थन में और पाकिस्तानी हरकतों के विरुद्ध खड़ा दिखाई दिया। एक तरफ सारा भारत भारतीय सेनाओं की प्रशंसा में मग्न है तो दूसरी तरफ भारतीय सेनाएं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक व्यवहार से प्रसन्न दिखाई देती हैं।

भारतीय सेनाओं और केंद्र सरकार के बीच एक विषय अभी भी अनसुलझा दिखाई देता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार के रक्षा मंत्रालय तथा तीनों सेनाओं के मुख्यालयों को पूरी विशेषज्ञता के साथ एक टीम के रूप में दिखाई देना चाहिए। इस समस्या का समाधान एक छोटे से प्रयास से संभव हो सकता है। अब तक रक्षा सचिव किसी वरिष्" भारतीय प्रशासनिक अधिकारी को बनाया जाता रहा है। इसके स्थान पर यदि किसी सैन्य अधिकारी को रक्षा सचिव बनाया जाये तो रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं का समन्वय अधिक लाभकारी हो सकता है। वैसे श्री नरेंद्र मोदी के भावनात्मक नेतृत्व ने सेनाओं की इस समस्या को काफी हद तक हल कर दिया है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भारतीय सेना के सच्चे राजनीतिक सेनापति सिद्ध हुए हैं।

(लेखक भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी के उपाध्यक्ष हैं।)

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