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दलबदलुओं के साथ क्या करेगा मतदाता

👤 veer arjun desk 5 | Updated on:12 April 2019 3:12 PM GMT
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प्रेम शर्मा

फिलहाल 2019 के चुनाव के लिए अभी राजनीतिक दलो के प्रति आस्था, निष्"ा, विश्वास बदलने की नेताओं की शुरुआत हुई है। ऐसी शुरुआत अचानक हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव के कुछ दिन पूर्व या फिर टिकटों के वितरण के साथ शुरू होती है। अभी तो लगभग दो दर्जन ऐसे नेताओं ने पार्टी बदली है जिनका टिकट काटा गया या फिर कटने की पूरी संभावना थी। भाजपा के श्यामा चरण गुप्ता और सवित्री बाई फूले तो कांग्रेस के टॉम वडक्कन का सामने है। अभी तो इसकी शुरुआत है लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव मतदान तक यह आकड़ा सभी दलों को मिलाकर लगभग सौ को पार कर जाएगा। यानि लोकसभा 2019 में भी लगभग 100 दलबदलुओं पर मजबूरन राजनीतिक दलों को अपना "प्पा लगाना पड़ेगा। एक चर्चा के मुताबिक जहां इस बार भाजपा अपने लगभग 80 सांसदों के टिकट काट रही है उनमें से 50 का दल बदलना तय माना जा रहा है। वही कांग्रेस में भी भगदड़ जारी है।

बसपा और सपा ग"बंधन के बाद बसपा और सपा के वे दिग्गज नेता जो 2019 में लोकसभा की तैयारी में जुटे थे उनकी भी आस्था कही से टिकट मिलने पर बदल सकती है। यही हाल अन्य प्रांतों के क्षेत्रीय दलों में मचा हुआ हैं। ऐसे में यह तय है कि इस चुनाव में भी दलबदलू प्रत्याशियों की भरमार होगी। आम चुनाव की घोषणा होते ही दलबदल शुरू हो जाना कोई नई-अनोखी बात नहीं, लेकिन सोचनीय यह कि दलबदलुओं टिकट के लिए इतना गिर जाना कहा तक उचित है। दो दिन पहले तक दल विशेष की भयंकर आलोचना करने वाले नेता जिस तरह बिना किसी हिचक के उसी दल में शामिल हो जा रहे हैं वह हैरानी भरा है। भाजपा में शामिल हुए कांग्रेस के वरिष्" नेता टॉम वडक्कन का मामला ऐसा ही है। यह अजीब है कि वह जब तक कांग्रेस में थे तो पार्टी नेतृत्व के करीबी लोगों में गिने जाते थे, लेकिन भाजपा में जाते ही उनके पुराने साथियों की ओर से यह कहा जा रहा है कि वह तो कोई बड़े नेता ही नहीं थे। जनता दल-एस के नेता दानिश अली का है। वह अभी कल तक अपनी पार्टी और कांग्रेस के बीच तालमेल बै"ा रहे थे, लेकिन अचानक बसपा में शामिल हो गए।

टॉम वडक्कन और दानिश अली का मामला तो शुरुआत है। ऐसे दलबदल लगातार सामने आ रहे हैं और यह तय है कि इसमें अभी और तेजी आनी है। ज्यादातर दलबदल इसीलिए हो रहे हैं, क्योंकि चुनाव लड़ने के इच्छुक नेताओं को या तो फ्रत्याशी नहीं बनाया जा रहा है या फिर उन्हें मनपसंद सीट नहीं मिल रही है। आखिर ऐसे नेता किस तरह विचाराधारा आधारित राजनीति को बल दे सकते हैं? मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल भी जिताऊ उम्मीदवार की तलाश में या फिर विरोधी दल के मनोबल या समीकरण को फ्रभावित करने के लिए दलबदलुओं को खुशी-खुशी गले लगाना पसंद करते हैं। इस क्रम में वे यह भी नहीं देखते कि कल का जो विरोधी आज उनके दल में शामिल हो रहा है वह परसों तक उन्हें समाज और देश के लिए खतरा बताया करता था। निश्चित तौर पर हर नेता राजनीतिक हित की परवाह करता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें यह ढोंग करने की सुविधा भी मिले कि वे मूल्यों-मर्यादा की राजनीति कर रहे हैं? ऐसे में इस ढोंग का कोई इलाज खोजना केवल मतदाता के बस में है। क्योंकि भारतीय राजनीति एक ऐसे युग में फ्रवेश करती जा रही है जिसका कोई नियम नहीं दिखता। बड़ी संख्या में हो रहे दलबदल से यह भी पता चल रहा है कि विचारधारा इस बात का प्रमाण है कि जनता के प्रति राजनेता, नेता और पार्टी पूरी तरह गैर जिम्मेदार है।

विचारधारा ऐसी चीज नहीं कि रातोंरात बदल जाए। यह समझ आता है कि कोई नेता समान विचारधारा वाले किसी दल में शामिल हो जाए, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि खुद को कांग्रेस का सिपाही बताने वाला भाजपा में चला जाए या फिर भाजपा की विचारधारा को अपने जीवन का लक्ष्य बताने वाला रातोंरात कांग्रेसी बन जाए? जब वस्त्र बदलने की तरह से विचारधारा बदली जाए तो यह समझ लिया जाना चाहिए कि केवल संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को महत्ता दी जा रही है। इससे राजनीति और अधिक अनैतिक ही होगी। दलबदल की इस बीमारी से बचने के लिए पिछले बीस-पच्चीस बरसों में कई कोशिशें हुई हैं। संविधान के 91वें संशोधन के जरिये ऐसी स्थिति बना दी गई कि अब दल बदलने वाले को सदन की सदस्यता भी छोड़नी होगी। लेकिन इसका उतना असर नहीं पड़ा जिसका अनुमान लगाया जा रहा था। दलबदल को अमेरिका में इसे पाला बदलना कहते हैं और न्यूजीलैंड में नाव बदलना। एक्वाडार में इस बीमारी के लिए बड़ा रोचक शब्द है-केमीसेट्जा। इसका अर्थ होता है कमीज बदलना। मोरक्को में इसे राजनीतिक खानाबदोशी की संज्ञा दी गई है। चूंकि सामान्यतः दलबदल विपक्ष से सत्ता दल की तरफ अथवा सत्ता में आने के लिए होता है, इसलिए यह सवाल उ"ना स्वाभाविक है कि राजनेता किसी लालच में तो यह काम नहीं करते? अकसर यह काम लालच में ही होता है और इसीलिए इसे जनतंत्र की एक बीमारी कहा गया है। लेकिन सवाल उ"ता है कि क्या दलबदल विरोधी कानून बनाकर हम व्यक्ति के सोच के अधिकार अथवा सोच के विकसित होने के अवसरों पर फ्रतिबंध नहीं लगा रहे? दूसरे, क्या पार्टी के आदेशों के अनुसार चलने की पाबंदी व्यक्तित्व के विकास में बाधक नहीं है? यह सैद्धांतिक बात है और कई बार सब कुछ सिद्धांतों के आधार पर तय करना संभव नहीं रह जाता, फिर भी व्यक्ति की वैचारिक आजादी के अधिकार के बारे में कहीं न कहीं सोचा ही जाना चाहिए। दूसरी बात मतदाता के अधिकार से जुड़ी है। उसे अपने फ्रतिनिधियों से यह जाने का हक क्यों न हो कि वे किस आधार पर कमीज बदल रहे हैं? यही नहीं इस दलबदल के चलते राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भी भारी असंतोष, अविश्वास का संचार होता है। उत्तर प्रदेश का वर्तमान समय का राजनीतिक घटना क्रम इसका जीता जागता प्रमाण है। उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों द्वारा अब तक घोषित उम्मीदवारों को देखकर यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों ने निष्"ावान, पार्टी का झंडा उ"ाने वाले, ला"ाr खाने वालों को टिकट वितरण के दौरान नजरंदाज करते हुए दलबदलू, धनबली, बाहुबली या पार्टी के बड़े नेताओं के बहु, बेटों, बेटियों पर विश्वास जताया है। जहां एक दल द्वार कार्यकताओं को दर किनार कर 15-15 करोड़ में टिकट बेचने की चर्चा आम है वही दूसरे दल में आधा दर्जन सीटों पर केवल पारिवारिक लोगों को उम्मीदवार बना दिया गया है। सबसे सोचनीय बात यह कि ऐसा किसी एक विशेष दल में नहीं हो रहा है बल्कि हर दल चुनाव जीतने के लिए ऐसा कर रहा है। इस बारे में चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, केंद्र और राज्य सरकारों के साथ आम मतदाता को विचार करना होगा कि जो नेता अपनी पार्टी का नहीं हुआ वह जनता का कैसे होगा? मतदाता इस बात को गां" बांध ले कि उसे किसी भी हालत में दलबदलू को मत नहीं देना है भले वह कितना बड़ा नेता क्यों न हो।

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