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बंगाल पर भारी वामपंथी अंदाज का शासन

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:16 May 2019 6:34 PM GMT
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तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने वामपंथी शासन को करीब से देखा, उसका अनुभव किया। तब वामपंथी कैडर की अराजकता अराजकता उन्हें भी झेलनी पड़ती थी। उस समय सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करने बड़े जोखिम का कार्य था। ममता बनर्जी ने इसी शासन से पश्चिम बंगाल को मुक्त करने का अभियान चलाया। इसमें भारतीय जनता पार्टी ने उनका सहयोग किया था। किसानों की जमीन के मुद्दे पर उन्होंने अनशन किया था, भाजपा की ओर से राजनाथ सिंह समर्थन व्यक्त करने के लिए उनके अनशन स्थल पर पहुंचे थे। बंगाल के लोग जानते थे कि कांग्रेस इन वामपंथियों को सत्ता से नहीं हटा सकती, इसलिए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया। ममता बनर्जी का वादा था कि वह वामपंथी से बंगाल को निजात दिलाएगी।

इस वादे के साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। ऐसा लग की वह प्रजातांत्रिक व्यवस्था को पटरी पर लाएगी, सतारूढ़ पार्टी के कैडर की अराजकता समाप्त करेंगी, वोटबैंक की राजनीति को तरजीह नही देंगी। वह लंबे समय तक भाजपा की सहयोगी रही, राष्ट्रीय जनतांत्रिक संगठन में शामिल रही, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रही, यही वह समय था जब ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस को पीछे छोड़ रही थी। राजग में रहते हुए उन्हें यहां प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला। वह वामपंथियों के सीधे मुकाबले में आ गई। उनके मुख्यमंत्री बनने का आधार यहीं तैयार हो गया था।

लेकिन सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी अपने वादे भूल गईं। शायद उन्हें लगा होगा कि यहां लंबी पारी खेलने के लिए वामपंथी अंदाज की राजनीति व शासन करना चाहिए। इसीलिए उन्होंने वोटबैंक की सियासत शुरू की। अपनी पार्टी के कैडर को मनमानी करने की खुली छूट दी। इस बार लोकसभा चुनाव में उनके कैडर की मनमानी और अराजकता खूब चर्चा में रही। वामपंथी शासन में प्रदेश की पुलिस पार्टी कैडर के सामने मूकदर्शक रहती थी।

लगता है कि ममता बनर्जी ने भी यही परंपरा कायम रखी। बताया जाता है कि बड़ी संख्या में वामपंथी कैडर तृणमूल कांग्रेस में आ गया था। इनकी ट्रेनिग दुरुस्त थी। सब कुछ वैसा ही चल रहा था। लोकसभा चुनाव के प्रत्येक चरण में इस कैडर ने दबंगई दिखाई। प्रदेश की पुलिस मूकदर्शक बनी रही। मुख्यमंत्री अराजकता फैलाने वालों का बचाव करती रहीं।

भाजपा अध्क्ष अमित शाह के रोड शो में हिंसक तरीके के बाधा पहुंचाई गई। ममता बनर्जी ने इसका बचाव किया। चुनाव आयोग ने बहुत देर में सही कदम उठाया। उंसकी रिपोर्ट से साबित है कि सत्ता पक्ष की ओर से अराजकता की गई। प्रदेश की पुलिस व अधिकारियों ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। यह कदम पहले चरण के समय ही उठा लेना चाहिए था। अमित शाह ने कहा भी है कि यहां पहले चरण से ही जमकर चुनावी हिंसा हो रही है। प्रत्येक चरण के बाद भाजपा ने मतदाताओं को रोक जाने, मतदान के भीतर मनमाने तरीके से मतदान कराने की शिकायत प्रमाण सहित चुनाव आयोग से की गई। लेकिन आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। पश्चिम बंगाल में आयोग पूरी तरह से मूकदर्शक बना रहा। पूरे देश में चुनाव के पहले हिस्ट्रीशीटर को हिरासत में ले लिया गया, लेकिन पश्चिम बंगाल में एक भी हिस्ट्रीशीटर को हिरासत में नहीं लिया गया। चुनाव आयोग का यह दोहरा मापदंड है। शाह ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया है।

अमित शाह ने पत्रकारों को रोड शो की तस्वीर भी दिखाई। जिसमें सीआरपीएफ का जवान प्लास्टिक शील्ड से अमित शाह को बचाता दिख रहा है। सामने आगजनी हो रही हैं। सात किलोमीटर लंबे रोडशो में तीन बार हमले की कोशिश की गई। तीसरी बार पूरी तैयारी के साथ हमला किया गया था। जिनमें पत्थरबाजी के साथ साथ बोतलों में मिट्टी का तेल और पेट्रोल भरने के बाद उनमें आग लगाकर भी फेंका गया। सुबह से ही विश्वविद्यालय परिसर की ओर से रोडशो पर हमले की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन इसे रोकने के लिए स्थानीय पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया। अमित शाह ने ममता बनर्जी को इस घटना की कोलकाता हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की ओर गठित एसआइटी से कराने की चुनौती दी।

ईश्वर चंद्र विद्या सागर की प्रतिमा कालेज के भीतर कमरे में है। शाह ने तस्वीर जारी कर दिखाया कि रोड शो के तत्काल बाद भी परिसर का गेट बंद है। कालेज प्रशासन पर तृणमूल का कब्जा है। जब परिसर और प्रतिमा वाले कमरे के ताला नहीं टूटा तो उन्हें किसने खोला। ममता बनर्जी प्रतिमा तोड़कर सहानुभूति बटोरने का प्रयास कर रही है। ममता बनर्जी ने भाजपा पर मूर्ति तोड़ने का आरोप लगाया था।

यह महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की पुलिस पर विश्वास नहीं किया। उसने पांचवें चरण के चुनाव में ही पोलिंग बूथ पर अब पश्चिम बंगाल पुलिस की तैनाती रोक दी थी। इसकी जगह केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के आदेश दिए थे। यह ममता बनर्जी के शासन पर सीधा सवाल था। वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के निर्वाह में विफल रहीं थी। लेकिन उन्होंने अपने अराजक कार्यकर्ताओं का बचाव जारी रखा। अमित शाह के रोड में हुई हिंसा पर भी उन्होंने यही रुख अपनाया। कहा कि गुंडों को बाहर से लाया गया था, उन्होंने भगवा पहनकर हिंसा की। इस कथन को भी अपनी वोट बैंक राजनीति से जोड़ दिया। कहा कि बाबरी ढांचे के समय भी ऐसा हुआ था।

जाहिर है कि ममता केवल वोट बैंक की सियासत कर रही है। जबकि चुनाव आयोग ने राज्य के प्रधान सचिव और गृह सचिव की छुट्टी कर दी है। बंगाल अपर महानिदेशक को गृह सचिव की जिम्मेदारी मुख्य सचिव को दी गई है। इसके अलावा निर्धारित समय से उन्नीस घंटे पहले चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी, यह सभी तथ्य ममता बनर्जी के शासन पर प्रश्नचिन्ह लगाते है।

(लेखक विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में राजनीति के एसोसिएट पोफेसर हैं।)

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