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मोदी के मुकाबले कौन?

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:19 May 2019 6:39 PM GMT
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चुनाव तक अब पधानमंत्री के लिए गैर भाजपाई दलों ने चील झपट्टा शुरू। मतगणना का परिणाम जारी होने से पहले जहां भाजपा 300 सीटें जीतकर दूसरी बार सरकार बनाने जा रही हैं वहीं ग"बंधन या महाग"बंधन या दूसरा मोर्चा पहचान बनाने की कोशिश हो रही है। मजेदार बात यह है कि इसके लिए जो लोग पयत्नशील हैं उनमें आंध्र और तेलंगाना के मुख्यमंत्री का नाम आगे आता है। यह दोनों ही भारत दर्शन पर निकल पड़े हैं। दोनों को यह उम्मीद है कि उनके पयास को सफलता मिलेगी। यद्यपि ग"बंधन में जो 24 दल शामिल बताए जाते हैं उसमें ऐसे भी दल हैं जिसमें उनका लोकसभा में कोई पतिनिधित्व भी नहीं था। और ऐसे भी दल हैं जिसके अस्तित्व पर संकट छाया हुआ है। भाजपा विरोधी फ्रंट का नेता कौन होगा इसकी काफी अटकलें लगाई जा रही हैं। खासतौर पर अखिलेश यादव द्वारा यह कहे जाने के बाद पधानमंत्री उत्तर पदेश का ही होगा और वह एक महिला होगी साफ कर दिया है कि उनके पास नेता जी मुलायम सिंह को पधानमंत्री बनाने के लिए कुछ महीने किए गए पचार अब नहीं किए जा रहे हैं और इससे एक महिला उत्तर पदेश से पधानमंत्री होगी ऐसा कहकर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के सामने आत्म समर्पण कर दिया है। चन्द्रबाबू नायडू लोकसभा चुनाव से पहले एक मोर्चा ग"ित किया था जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी लेकिन तेलंगाना के चुनाव में तेलंगाना राष्ट्र समिति के सामने उसने घुटने टेक दिए। वे भी गैर कांग्रेसी मोर्चे के लिए उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तथा तमिलनाडु के राजनीतिक भेंट मुलाकात कर रहे हैं। कांग्रेस दुविधा में है। इसलिए उसने यह शिगूफा छोड़ रखा है कि विपक्षी दलों में उसकी संख्या सबसे ज्यादा होगी उसी का पधानमंत्री होगा। पिछले चुनाव में मात्र 44 सीटें पाने वाली कांग्रेस 150 सीटें जीतने का दावा कर रही है। अभी जो राजनीति का खुमार है उसमें न ज्यादा नियमावली या साधारण बोलचाल में शालीनता से परहेज किया है। हमें यह याद नहीं आता कि किसी देश के लोगों ने सत्ताधारी दल के अध्यक्ष या पधानमंत्री ऐसे शब्दों का पयोग कर जो सामान्य रूप से अवांछनीय माना जाता है सत्ता में आने का जो उपक्रम कर रहे हैं शायद वह पूर्व में किए गए कर्तव्यों का दुष्परिणाम भूल गए और जाति संप्रदाय क्षेत्र यहां तक कि निम्न भेदभाव को बढ़ाकर जीत की आशा लगाए हुए हैं। यह शायद मानकर चलते हैं कि गरीबों को केंद्र में रखकर मोदी जी ने जो योजनाएं शुरू की हैं उसको गाली-गलौज से ढका जा सकता है।

शायद कोई ऐसी सरकार आएगी उज्ज्वला जैसे योजना लाएगा जिसमें पत्येक गरीब व्यक्ति को बीमारी की हालत में पांच लाख रुपए का लाभ मिलेगा। स्वच्छता की बहुत बात की जाती है लेकिन उसके लिए जो पहली आवश्यकता थी घरों में शौचालय का अभाव। इस योजना से कई करोड़ भारतीय लाभ पा चुके हैं। शेष के बारे में लोगों को आशा है कि यह योजना पूरी होगी। मोदी ने दावा किया है और इस दावे का कोई विरोध नहीं हुआ कि देश के पत्येक गांव में बिजली पहुंच चुकी है अब पत्येक घर में बिजली पहुंचाने का काम शुरू हो गया। पधानमंत्री जनधन योजना के तहत जो लाभार्थी होंगे उन्हें उनके खाते में बिना बिचौलिये के जमा किया जाएगा। अब पत्येक किसान न केवल बैंक से जुड़ जाएगा बल्कि उसकी एक हैसियत भी हो जाएगी। कृषि की पैदावार 2022 तक दो गुनी करने का वादा उससे भी बड़ी बात यह है कि सरकार और लाभ पाने वाले के बीच जो बिचौलिये कूद पड़ते थे जिसके कारण दिल्ली से आया हुआ एक रुपया लाभार्थी के पास मात्र 15 पैसा पहुंचता था अब पूरा पैसा पहुंच रहा है।

मतदान के अंतिम क्षण तक और गणना शुरू होने तक अनेक ऐसे मसले उछाले गए उससे मोदी के पति बना आकर्षण कम हो जाए। मोदी की लोकपियता और बढ़ती गई। 2014 के चुनाव में भी मोदी ने जो वादे किए थे यद्यपि वह सभी पूरे नहीं हो सके लेकिन पांच वर्ष के शासनकाल में जो वादे किए थे उनकी दिशा में तेजी से आगे बढ़कर विश्व शक्ति के रूप में अन्य कोई देश अपना स्थान बनाने में सफल नहीं हुआ। उनकी कूटनीति का जो परिणाम है विश्व बिरादरी में पाकिस्तान अकेला पड़ गया है और उसको विवश होकर आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी भले ही वह दिखावा मात्र हो। आर्थिक सुधार की दिशा में तीन महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। एक सेवा और वस्तुकर में सर्वसम्मति से सुधार और दूसरा नोटबंदी जो भ्रष्टाचार रोकने के लिए था।

पिछले दिनों भारत की औकात के बारे में विश्वभर में आकलन की लगी होड़ ने अपने-अपने हिसाब से विरोध और अभिव्यक्तियां की गई हैं। उससे कुछ पढ़े-लिखे लोग भले ही नाराज हो जायं लेकिन ग्रामीण और शहरी वासी उन्हीं के पक्ष में डटा है। क्योंकि उनमें भी राजनीतिक समझदारी आ गई है। इस पूरे निर्वाचन में जनसभाओं के लिए किस पकार उत्तर पदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दौड़ाया गया है वह इस बात का पतीक है कि भाजपा के स्टार पचारकों में एक और नाम जुड़ गया है इसकी शालीनता, शुभेच्दा और परिश्रम पर कोई अंगुली नहीं उ"ा सकता। मोदी और योगी की जुगल जोड़ी न केवल कार्यकर्ताओं में उत्साह भरा है बल्कि विरोधियों को हताश भी किया है। यही कारण है कि विपक्ष जो कि मोदी से भयभीत है चुनाव के पूर्व हुई एकजुटता का स्वरूप मंचों से नीचे नहीं उतरा। मोदी के पभाव से भय खा गए। अस्तित्व रक्षा के लिए कहीं-कहीं एक दो दल के नेता आपस में मिल गए। इससे लगता है कि राजनीति में उपस्थिति बनाए रखने के लिए ये दल चुनाव लड़ रहे हैं। एक अत्याचारी के रूप में उभरी ममता बनर्जी अपने पत्ते नहीं खोले हैं वहीं राष्ट्रीय ग"बंधन में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के पति किसी पकार का अविश्वास नहीं है। इसलिए मंचीय एकता और किसी खास स्थान पर खड़े होकर नारे लगाने में वे दल जुट गए हैं जो मोदी विरोधी हैं। इस चुनाव में सभी दलों और नेताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका केवल मौखिक रूप से नहीं अपितु लिखित रूप में स्पष्ट करने का यह तरीका अपनाया है। और बड़े-बड़े नेताओं को घुटने टेकने के लिए मजबूर किया है वह इलेक्शन को निष्पक्ष बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसी के साथ एक पक्ष यह भी है कि करीब पांच हजार करोड़ की धनराशि विभिन्न छापों में बरामद की गई। यह कदम भी चुनाव में बाहुबल और धनबल के सहारे चुने जाने वाले दलों को समझ में आ जाना चाहिए।

किन्तु अभी तो मोदी विरोधी धड़े का नेता खोजा जा रहा है। इस खोज में अपना पक्ष आगे करने में कोई संकोच नहीं करता। इसलिए चाहे ममता बनर्जी हों मायावती शरद पवार यहां तक कि चन्द्रबाबू नायडू स्थान बनाने का पयास कर रहे हैं। जो एकता चुनाव के दौरान नहीं दिखाई दी वह चुनाव के बाद कैसे बनेगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ दल हैं जो ममता बनर्जी के समान केंद्र से भिड़ना नहीं चाहते। ऐसे दलों में उड़ीसा की सत्तारूढ़ पार्टी का नाम पमुखता से लिया जा सकता है। क्षेत्रीय दल केंद्र की सत्ता के साथ संबंध बनाने में सदैव आगे रहे हैं। इसीलिए विपक्षी एकता के लिए जो पयत्न हो रहे हैं उसमें सफलता की संभावना कम नजर आ रही है। मोदी के मुकाबले कौन का उत्तर देने में अक्षम महाग"बंधन बिखरकर आपस में ही लड़ना शुरू कर दिया है। जैसा कि इससे पहले कई बार हो चुका है।

(लेखक राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं।)

राजनाथ सिंह `सूर्य'

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