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पित्रोदा का बयान, 84 के पीड़ितों का अपमान

👤 Veer Arjun Desk 4 | Updated on:15 May 2019 6:40 PM GMT
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`जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।' 19 नवंबर, 1984 को यह शब्द कहे थे तत्कालीन प्रधानमंत्री और इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राजीव गांधी ने बोट क्लब में इकट्ठा हुए लोगों के हुजूम के सामने। 10 मई 2019 को इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने 1984 के सिख दंगों को लेकर एक विवादित बयान दिया है। एक सवाल के जवाब में पीएम मोदी पर टिप्पणी करते हुए पित्रोदा ने कहाöअब क्या है 84 का? आपने क्या किया पांच साल में उसकी बात करिए। 84 में जो हुआ वो हुआ, आपने क्या किया। राजीव गांधी के इस बयान से यह संदेश गयाö`मानो इन हत्याओं को सही ठहराने की कोशिश की जा रही थी।' इस वक्तव्य ने उस समय काफी सनसनी मचाई थी और उसको जायज ठहराने में कांग्रेस पार्टी को अभी भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। पित्रोदा का बयान कोढ़ में खाज के समान है।

साल 1984 में सिख विरोधी दंगे इंडियन सिखों के खिलाफ थे। इसके पीछे कारण था तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या, जिनकी हत्या उन्हीं के अंगरक्षकों ने की थी जोकि सिख थे। इन दंगों के कारण भारत में खून की होली खेली गई थी। इन दंगों में 3000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जिसमें 2000 से ज्यादा लोग दिल्ली में मारे गए थे। इन दंगों में हजारों सिखों के घर-दुकानें जला दिए गए। सैकड़ों सिखों को पेट्रोल-डीजल डालकर जला दिया गया। गले में टायर डालकर आग लगा दी और इन दंगों के दौरान लाखों की संख्या में सिख विस्थापित हुए। लाखों सिखों को अपना घर छोड़ना पड़ा। और तो और हजारों सिखों को अपनी जान बचाने के लिए बाल कटवाने पड़े। हजारों की संख्या में सिख, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा से निकल कर यूपी, बिहार समेत कई अन्य प्रदेशों के छोटे-छोटे गांवों में जाकर बस गए। वो अलग बात है कि सरकारी कागजों में इस घटना को सिख विरोधी दंगों के तौर पर दर्ज किया गया है, असलियत में देश में सिख विरोधी दंगे नहीं बल्कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित नरसंहार था, जिसके निशाने पर सिख समुदाय था।

देश में लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में है। छठे चरण की वोटिंग से ठीक पहले गांधी परिवार के करीबी पित्रोदा के इस बयान ने देश की सियासत में बंवडर ला दिया है। नाराज सिख सड़कों पर इस बयान का विरोध कर रहे हैं तो वहीं प्रधानमंत्री मोदी चुनावी रैली में इस बयान के बरक्स कांग्रेस के चाल और चरित्र का विशलेषण कर रहे हैं। चुनावी गरमागरमी, बयानबाजी और सियासत के बीच पित्रोदा का यह बयान सोचने को मजबूर करता है कि हमारे देश के नेताओं व राजनीतिक दलों का चरित्र कैसा है? राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए देश और देशवासियों से खिलवाड़ करने वाले नेता किस तरह सीना तानकर अपने कुकर्मों पर पूरी बेशर्मी और तार्पिकता के साथ परदा डालने की कोशिश करते हैं और किस तरह वो पूरे देश के सामने घटी घटनाओं को झुठलाने की कोशिशें करते हैं।

सन 1984 में निहत्थे व बेकसूर सिखों के सामूहिक कत्लेआम के 35 सालों बाद सेम पित्रोदा का निहायत गैर जिम्मेदाराना और बेशर्म बयान काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह हालात तब है जब दिल्ली में ऐसे सैकड़ों चश्मदीद गवाह मौजूद है जिन्होंने कांग्रेस नेताओं को हिंसक भीड़ का नेतृत्व करते देखा है। कांग्रेस नेता सज्जन कुमार सिख दंगों में अपनी भूमिका के चलते ही आज सलाखों के पीछे हैं। आज भी हजारों सिख परिवार न्याय की आस में अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में कांग्रेसी नेता का बेशर्म बयान `जो हुआ, सो हुआ' कांग्रेस के चरित्र का बखूबी बयान करती है। 1984 के सिख नरसंहार पर काफी सियासत खेली गई थी क्योंकि नरंसहार के बाद सीबीआई ने कहा था कि यह दंगे राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस ने मिलकर कराए हैं।

1984 के दंगों की चोट के घाव आज भी ताजा है आज भी तमाम सिख परिवार हैं, जिनके दिलों में 1984 के दंगों की चोट के घाव आज भी ताजा हैं और पित्रोदा जैसे लोग जब उन दंगों के बारे में शर्मनाक बयान देते हैं तो घाव बार-बार हरे हो जाते हैं। दंगों के 21 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में इसके लिए माफी मांगी और कहा था कि जो कुछ भी हुआ, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन क्या इतना कहने भर से ही सरकार का फर्ज पूरा हो गया? क्या इससे आजाद भारत के सबसे सबसे बुरे हत्याकांड की यादें मिट गईं?

इतिहास के पन्ने पलटिए तो दिल्ली की सड़कों पर लगातार तीन दिनों तक सिखों का संहार होता रहा। संसद ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई सिखों की हत्याओं की निंदा करते हुए कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया। जबकि नई सरकार के गठन के फौरन बाद जनवरी, 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इंदिरा गांधी की हत्या और भोपाल गैस त्रासदी के मृतकों के प्रति दुख जताया। फरवरी 1987 में एक और चूक हुई. 1984 दंगों पर एक रिपोर्ट संसद में पेश की गई। सदन में भारी बहुमत का दुरुपयोग करते हुए राजीव गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट पर सदन में चर्चा की इजाजत नहीं दी। इस मुद्दे पर संसद का मुंह दबाना सरकार के अपने उस अड़ियल रवैये को जाहिर करता है, जो उसने सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत जज की जांच में मिली क्लीन चिट के बाद हासिल किया था। मिश्र को भारत का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, वो मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष बने और फिर राज्यसभा में कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। अगस्त 2005 में जब मनमोहन सिंह सरकार ने इसी विषय पर एक दूसरे जांच आयोग की रिपोर्ट संसद में पेश की, तब जाकर 21 साल पुरानी घटना पर संसद में चर्चा हुई। वो भी इसलिए कि केंद्र सरकार को न्यायमूर्ति नानावती आयोग की जांच रिपोर्ट स्वीकार करने पर मजबूर किया गया। इस रिपोर्ट में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद सज्जन कुमार को बाद में दोषी न ठहराने की बात का पा था। यह सब तथ्य साफतौर पर इशारा करते हैं कि इन दंगों को लेकर कांग्रेस और उसके नेताओं की सोच क्या थी और क्या है?

कुछ साल पहले इन दंगों पर नजर डालने वाली एक किताब `व्हेन एंट्री शुक डेल्ही' छपी थी। इसमें दंगे की भयावहता, हताहतों और उनके परिजनों के दर्द और राजनेताओं के साथ पुलिस के गठजोड़ का सिलसिलेवार ब्यौरा है। जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी तो हमारे देश में कुछ दंगे-फसाद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता को कितना क्रोध आया, कितना गुस्सा आया और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान 84 के दंगों पर दो किताबें चर्चा में आई थी। पहली तो संजय सूरी कीö1984 दि एंटी-सिख वॉयलेंस एंड आफ्टरöजिसमें कमलनाथ की उन दिनों में संदिग्ध और संभवत आपराधिक भूमिका पर विस्तार से बात की गई है। दूसरी नीलांजन मुखोपाध्याय कीöसिख्स ः दि अनटोल्ड एगोनी ऑफ 1984। अब एक बार फिर 84 के सिख दंगों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है।

तमाम मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1984 में सेना की तैनाती में जानबूझकर देरी की गई, पुलिस ने दखल देने से इंकार कर दिया, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमल नाथ, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने दंगाइयों का नेतृत्व किया जिन्होंने सिखों को मारा और उनका सामान लूट लिया। दंगाई साफतौर पर किसी के इशारों पर काम कर रहे थे और संगठित थे। इसके बाद पार्टी में कमलनाथ रॉकेट की तरह ऊपर उठे। टाइटलर, भगत और सज्जन कुमार को बचाने की कोशिशें भी अच्छी तरह इतिहास में दर्ज हैं। पार्टी उन्हें चुनावों में उतारती रही और वे महत्वपूर्ण पदों पर काबिज रहें। अपने कर्तव्य का पालन करने में नाकाम रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। असल में पिछले साढ़े तीन दशकों से कांग्रेस नेताओं ने सिख दंगों के लिए देश की जनता से माफी मांगने की बजाय गुनाहगारों का बचाने की हर संभव कोशिश की है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि सैम पित्रोदा ने आवेश या भावनाओं में बहकर यह बयान नहीं दिया, और न ही उनकी हिंदी इतनी कमजोर है कि वो कुछ का कुछ बोल जाएं। असल में चुनावी माहौल में पित्रोदा ने सोची समझी रणनीति के तहत बयान दिया। वो अलग बात है कि कांग्रेस की दिलेरी और बेशर्मी उस पर भारी पड़ गई। चुनावी रंग में भंग पड़ते देख बैकफुट पर आई कांग्रेस ने सैम पित्रोदा के बयान से पल्ला झाड़ लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा कि वे सैम पित्रोदा के बयान से सहमत नहीं हैं। उन्होंने बयान को लेकर सैम पित्रोदा को नसीहत देते हुए कहा कि सैम पित्रोदा को बयान को लेकर माफी मांगनी चाहिए। राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में 1984 दंगों को दुखद त्रासदी बताया। डैमेज कंट्रोल के लिए राहुल गांधी अब भले ही जो भी बयान दे, सैम पित्रोदा के बयान से कांग्रेस का असली चरित्र और चेहरा देश की जनता के सामने आ चुका है। राजनीतिक दलों और नेताओं का ऐसी बेशर्म बयानबाजी पीड़ितों के जख्मों को हरा कर देती है। ऐसे बेशर्म, गैर-जिम्मेदाराना और असंवदेनशील राजनेताओं और राजनीतिक दलों की जितनी निंदा की जाए कम है। ऐसे नेताओं व राजनीतिक दलों का बहिष्कार और हुक्का पानी जनता को बंद कर देना चाहिए।

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