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क्या चीन से संबंधों में सुधार हो रहा है

👤 | Updated on:3 April 2010 1:58 AM GMT
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यह बात सारी दुनिया जानती है कि एशिया में चीन सबसे बड़ा देश है और उसके बाद भारत आता है और भारत के बाद इंडोनेशिया और उसके बाद शायद पाकिस्तान का नाम आता है। यह बात भी किसी से छिपी नहीं कि चीन भारत के मुकाबले पर पाकिस्तान को खड़ा करने की कोशिश करता रहता है। वस्तुस्थिति यह है कि पाकिस्तान के दोनों हाथों में लड्डू हैं। मेरा इशारा चीन और अमेरिका की तरफ है। गलत न होगा अगर कहा जाए कि दोनों ही छफ्पर फाड़कर पाकिस्तान की हर तरह की मदद कर रहे हैं और ऐसा करते हुए चीन भारत को अपना दुश्मन समझने लग जाता है और अमेरिका असमंजस में पड़ जाता है। इसलिए कि उसे पाकिस्तान की रविश और उसके नजरियात से किसी किस्म की हमदर्दी न थी। लेकिन मध्य-पूर्व में जहां यह अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहता है।  वहां यह पाकिस्तान की तरफ देखता रहता है और इस तरह हिन्दुस्तान से दोस्ती की ख्वाहिश रखते हुए भी वो पाकिस्तान को किसी तरह भी नाराज नहीं होने देना चाहता और इस वजह से आए दिन हिन्दुस्तान के एकमात्र दुश्मन पाकिस्तान को वो सीने से लगाता रहता है। इस बात का यह असर हुआ है कि भारत और अमेरिका जो दुनिया के दो ऐसे देश हैं जिनकी अवाम एक दूसरे के नजदीक आना चाहते हैं, उनकी सरकारें अपने अमल से उनके रास्ते में रोड़े डालती रहती हैं। वस्तुस्थिति यह है कि हिन्दुस्तान अमेरिका से बिरादाराना संबंधों के लिए तड़पता है। लेकिन अमेरिकन अधिकारी जुबानी जमा खर्च में अमल की बजाय ज्यादा विश्वास करते हैं। नतीजा यह हो रहा है कि इन दोनों के बीच संबंधों में जो दोस्ताना माहौल होना चाहिए, वह नहीं हो रहा। चीन और सारी दुनिया यह बात देख रही है और गलत न होगा अगर यह कहा जाए कि चीन दोनों देशों के एक-दूसरे के नजदीक न आने का फायदा अपने हक में उठाने की सोच रहा है और इसका सबूत यह है कि उसने पिछले दिनों में भारत सरकार को अपने हक में करने के लिए एक ऐसा फैसला किया जिसकी कद्र हिन्दुस्तान को करनी पड़ी और वो यह कि चीन में 21 बंदी हिन्दुस्तानियों को अपने खानदान के लोगों से मिलने की इजाजत दे दी गई है। यह ऐसा दोस्ताना इशारा है कि हिन्दुस्तान की जनता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। जिन 21 भारतीयों को गिरफ्तार किया गया था उनके खिलाफ गैर-कानूनी तौर पर चीजें स्मगल करने और आर्थिक मामलों में किसी कदर हेराफेरी का इल्जाम था। लेकिन चीन ने इन्हीं दिनों एकदम से उम्मीद के विपरीत कदम उठाकर हिन्दुस्तानियों के रिश्तेदारों को उनसे मिलने की इजाजत दे दी है। ख्याल नहीं कि चीन ऐसी रियायत किसी और देश के लोगों को देगा। इस तरह भारत के विदेश मंत्री श्री एसएम कृष्णा, भारतीयों का एक प्रतिनिधिमंडल बीजिंग जा रहा है ताकि दोनों के संबंधों में किसी किस्म की सुधार का श्रीगणेश हो। याद रहे कि जनवरी के महीने में भारत के दिफाई सैक्रेटरी चीन से फौजी मामलों के लिए चीन गए थे। उसके एक महीने बाद भारत के कॉमर्स के वजीर श्री आनंद शर्मा ने चीन से चार साल के डेडलॉक के बाद बातचीत का दरवाजा खोला। इन सारी बातों का नतीजा यह है कि पिछले हफ्ते दोनों देशों के तर्जुमान मिलकर एक-दूसरे के देश में जाने के लिए वीजा के सवाल पर गौर करने को इकट्ठे हुए। यह भी कहा जा रहा है कि इस महीने में दोनों सरकारों के नुमाइंदे सीमावर्ती इलाकों के दरियाओं से संबंधित सवालों पर गौर करेंगे। स्पष्ट हो कि पिछले कुछ दिनों से यह खबरें आ रही हैं कि चीन ब्रह्मपुत्र के हिन्दुस्तान आने के रास्ते बदल रहा है। इस संबंध में गौर करने के लिए नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर श्री  शिवशंकर मेनन चीन जाएंगे। इन सबके अलावा व्यापारिक मामलों में भी कुछ सुधार हो रहा है। जनवरी-फरवरी के महीनों के व्यापारिक आंकड़े यह बताते हैं कि पिछले साल के मुकाबले में 55… व्यापार में बढ़ोतरी हुई है। काबिलेगौर बात यह है कि हिन्दुस्तान की 8.98 अरब डालर की गैर-मुल्की व्यापार में 3.49 अरब डालर पिछले साल के मुकाबले में 75… ज्यादा हुए हैं। बजाते खुद यह रकम कोई ज्यादा नहीं है। लेकिन आप जब गर्दोपेश के हालात पर नजर डालते हैं तो मानना पड़ता है कि दोनों के संबंधों में कुछ सुधार होना शुरू हो गया है और संतुष्टि की जो बात है वो यह कि चीन ने भी हिन्दुस्तान के संबंध में अपने नजरिये में कुछ परिवर्तन किया है। कौन-सी बातों ने चीनी सरकार को प्रेरित किया है, यह जानना तो आसान नहीं, लेकिन इतना जरूर कहा जा रहा है कि चीन के रवैये में कुछ परिवर्तन दिखने को मिल रहा है, यह सब वक्ती दिखावा है या स्थायी रूप से चीन भारत से संबंध सुधारना चाहता है, यह आइंदा चन्द दिनों के वाकयात से पता चल जाएगा। इस सबके अलावा अरुणाचल के शहरियों को वीजा से आजाद करने के सवाल पर भारत सरकार से जो मतभेद हो रहे थे उन्हें भी सुधारने की कोशिश हो रही है। इसका सबूत पिछले दिनों कोपनहेगन में मौसम के संबंधों में जो कांफ्रेंस हुई उसमें दोनों देशों का एक-दूसरे की नजरियों का समर्थन एक नुमायां बात है।  

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