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शशि थरूर की बरतरफी

👤 | Updated on:21 April 2010 9:34 PM GMT
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मैं जब आज से वर्षों पहले स्कूल में था तो मुझे क्रिकेट और हाकी का शौक था। स्कूल की क्रिकेट की टीम थी। उसमें मैं विकेट कीपर होता था। लेकिन जब डीएवी स्कूल से मैट्रिक पास करके सरकारी कालेज लाहौर में दाखिल हो गए तो ख्याल आया कि क्रिकेट खेल इतना बेहतर नहीं जितना कि टेनिस का खेल है। इसलिए क्रिकेट छोड़कर मैंने टेनिस खेलना शुरू कर दिया और आज से दो साल पहले तक टेनिस खेलता रहा। कई लोग मुझे पूछते थे कि इस उम्र में भी तुम यह खेल खेलते हो, इसका राज क्या है। इसलिए पूछा जाता था कि सारे अहम खिलाड़ी 50-55 की उम्र के बाद रिटायर हो जाते थे। लेकिन मैं पूज्य पिता जी के जिस अनुशासन के तहत चला उसने मुझे इतने दिनों तक यह खेल खेलने का मौका दिया जबकि आमतौर पर मेरे से कम उम्र के लोग खेलों से रिटायर हो जाते थे। मुझे उन दिनों की याद इसलिए आई कि आजकल क्रिकेट के स्कैंडल का काफी चर्चा हो रहा है। यह क्या है मैं नहीं जानता और हक तो यह है कि एक खिलाड़ी होते हुए भी मैंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि यह नया खेल क्या है। अगर मैंने उसे दुरुस्त समझा है तो उस पर हिन्दुस्तानी भाषा की एक कहावत पूरी तरह लागू होती है और वो यह है कि `कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा।' आप विश्वास करें कि इन दिनों मैंने इस नए खेल के बारे में एक शब्द नहीं पढ़ा और न ही जानने की कोशिश की है, यही वजह है कि आज तक क्रिकेट के जितने मैच हुए वो हर देश की बेहतरीन खिलाड़ियों की टीमों के हुए हैं जिसका नतीजा यह था कि मेरी ख्वाहिश यही होती थी कि जैसे भी हो मेरे देश की टीम जीते और इसलिए उसकी कार्यकार्दगी पर ज्यादा से ज्यादा नजर रखता। उसकी हार की हालत में मुझे मायूसी होती और फतह की हालत में खुशी। इसलिए मैं समझता था कि भारत की कोई टीम जीतती है और इस तरह भारत का नाम दुनिया की बेहतरीन टीमों में शामिल होने लगा। वस्तुस्थिति यह है कि आज यह दुनिया की हर टीम के मुकाबले में बेहतर साबित हुई है, इसलिए मुझे यह देखकर फख्र और खुशी होती है। लेकिन जहां तक इस नए निजाम का संबंध है मुझे कोई विजेता या हारा हुआ नजर नहीं आता। इसलिए कि जो टीमें खेल रही हैं वो किसी खास देश की नुमाइंदगी नहीं कर रही बल्कि निजी नुमाइंदगी कर रही हैं। इस वजह से मुझे इन टीमो के खेल में कोई दिलचस्पी महसूस नहीं होती है। और अब शशि थरूर का मामला मंजरेआम पर आया है। मैंने चूंकि शुरू में इस मामले में दिलचस्पी नहीं ली इसलिए मेरी समझ से यह बात बाहर है कि शशि साहब का क्या गुनाह था जिसके लिए आपको इतनी बड़ी सजा मिली कि आपको अपने औहदे से त्यागपत्र देना पड़ा। ऐसा क्यों हुआ, यह जानने के लिए मुझे पिछले कई दिनों के अखबार देखने पड़े थे। इतना वक्त मेरे पास कहां था। आज अपने संपादकीय के लिए ज्यादा से ज्यादा हालात को समझकर उनका निचौड़ अपने सामने रखूं और फिर उन्हें संपादकीय के तौर पर अपने पाठकों के सामने पेश करूं। यही वजह है कि मैंने आज तक इस विषय पर अपना कलम नहीं उठाया। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि शशि साहब ने कौन सा ऐसा गुनाह कर दिया जिसकी वजह से आपको मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। आज से पहले जब यह खबर कानों में पड़ रही थी कि शशि साहब को त्यागपत्र देना पड़ेगा तो मुझे इस बात का दुख हुआ। मैं उसे एक राष्ट्रीय नुकसान ही समझता रहा जिस शख्स ने कई वर्ष तक अकवामेमुतेहदा के साथ नत्थी होकर अंतर्राष्ट्रीय हालात को समझा। इससे संबंधित मेरे देश के लिए फख्र की बात थी, लेकिन देश की बदनसीबी और शशि का दुर्भाग्य कि वो कुछ दिन ही विदेश विभाग में काम करके अपना त्यागपत्र देने पर मजबूर हो गए। मैं यही सोचता था कि हमारे मंत्रिमंडल में बेशक राजनेताओं की पलटन है लेकिन उसमें से कितने ऐसे हैं जिन्हें विदेशी मामलों से निपटने का अनुभव हो। इसलिए जब शशि थरूर को मंत्रालय में शामिल किया गया तो मैंने यही समझा कि इससे भारत का नाम रोशन होगा। लेकिन किस्मत की बेवफाई ऐसी थी कि चंद दिनों के अंदर-अंदर आपको सरकारी औहदा छोड़ना पड़ा। खैर। जो होना था वो हो गया। लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि शशि साहब के खिलाफ किसी किस्म के बर्ताव के बेनियाज होकर सरकार उन्हें किसी और जिम्मेवार औहदे पर लगा देगी। इतने जिम्मेदार लोग हमें कहां मिलते हैं और अगर एक मामूली सी गलती की वजह से आपसे कोई गुनाह हो भी हो गया हो तो सजा देते हुए इस बात को ध्यान में रखना चाहिए था कि इतने अनुभवी और जहीन शख्स को बचाने की हर संभव कोशिश की जाए और हो सकता है कि कोई रास्ता निकल ही आए। लेकिन मंत्रिमंडल में जैसे लोगों की भर्ती हुई है उसे देखते हुए कम ही लोग उम्मीद करते हैं कि शशि साहब को माफ कर दिया जाए। लेकिन मैं आज तक समझ नहीं सका कि क्या उनका  किया जुर्म कितना संगीन था कि आपको सरकारी औहदे से त्यागपत्र देना पड़ा।

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