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नासिक का कालाराम मंदिर

👤 | Updated on:2013-11-29 00:25:32.0
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 दक्षिण काशी के नासिक में किसी समय प्रभु रामचंद्र का प्रवास रहा था। प्रभु श्रीराम ने जहाँ-जहाँ पग धरे वह भूमि पवित्र हो गई। उनके पदचिह्नों के रूप में अनेक मंदिर आज भी नासिक में नजर आते हैं।हम आपको लेकर चलते हैं नासिक के पंचवटी में स्थापित 'कालाराम' मंदिर। यूँ तो नासिक में प्रभु श्रीराम के कई मंदिर हैं। कालाराम, गोराराम, मुठे का राम, यहाँ तक कि महिलाओं के लिए विशेषराम आदि, परंतु इन सभी में 'कालाराम' की अपनी ही विशेषता है। ये मंदिर ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से महत्व रखता ही है, साथ ही इसकी बनावट में इस तरह का आकर्षण है कि जो मंत्रमुग्ध कर देता है।  पेशवा के सरदार रंगराव ओढ़ेकर द्वारा यह मंदिर 1782 में काले पाषाणों से नागर शैली में निर्मित कराया गया था। मंदिर में विराजित प्रभु श्रीराम की मूर्ति भी काले पाषाण से बनी हुई है, इसलिए इसे 'कालाराम' कहा जाता है। प्रभु श्रीराम के साथ ही यहाँ सीता व लक्ष्मण की भी आकर्षक प्रतिमाएँ विराजमान हैं। पूरा मंदिर 74 मीटर लंबा और 32 मीटर चौड़ा है। मंदिर की चारों दिशाओं में चार दरवाजे हैं। इस मंदिर के कलश तक की ऊँचाई 69 फीट है तथा कलश 32 टन शुद्ध सोने से निर्मित किया हुआ है। पूर्व महाद्वार से प्रवेश करने पर भव्य सभामंडप नजर आता है, जिसकी ऊँचाई 12 फीट होने के साथ यहाँ चालीस खंभे है। यहाँ विराजमान श्री हनुमानजी मंदिर में वे प्रभु श्रीराम के चरणों की ओर देखते हुए प्रतीत होते हैं। कहा जाता है कि ये मंदिर पर्णकुटी के स्थान पर बनाया गया है, जहाँ पूर्व में नाथपंथी साधु निवास करते थे। कहते हैं कि साधुओं को अरुणा-वरुणा नदियों पर प्रभु की मूर्ति प्राप्त हुई और उन्होंने इसे लकड़ी के मंदिर में विराजित किया था। तत्पश्चात 1780 में माधवराव पेशवा की मातोश्री गोपिकाबाई की सूचना पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया। उस काल के दौरान मंदिर निर्माण में 23 लाख का खर्च अनुमानित बताया जाता है। मंदिर परिसर में सीता गुफा है। कहा जाता है कि माता सीता ने यहाँ बैठकर साधना की थी। मंदिर के नजदीक से गोदावरी नदी बहती है, जहाँ प्रसिद्ध रामपुंड है। मंदिर की भव्य छटा देखते ही बनती है। कैसे पहँचेंः-नासिकमुंबई से 160 किमी तथा पुणे से 210 किमी दूरी पर स्थित है। वायु मार्गःमुंबई से नासिक हवाई मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है। रेल मार्गःनासिक मध्य रेलवे का महत्वपूर्ण जंक्शन है। मुंबई की ओर जाने वाली अधिकतर गाड़ियाँ नासिक होते हुए गुजरती हैं। सड़क मार्गःमुंबई-आगरा महामार्ग नासिक होते हुए गुजरता है। सिद्धनाथ वीर गोगादेव हम आपको ले चलते हैं सिद्ध वीर गोगादेव के जन्मस्थान, जो राजस्थान के चुरू जिले के दत्तखेड़ा में स्थित है। जहाँ पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं। नाथ परम्परा के साधुओं के लिएयह स्थान बहुत महत्व रखता है। दूसरी ओर कायम खानी मुस्लिम समाज उनको जाहर पीर के नाम से पुकारते हैं तथा उक्त स्थान पर मत्था टेकने और मन्नत माँगने आते हैं। इस तरह यह स्थान हिंदू और मुस्लिम एकता का प्रतीक है। मध्यकालीन महापुरुष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्ध हुए। गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वंश के राजपूत शासक जैबर (जेवरसिंह) की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से भादो सुदी नवमी को हुआ था। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था। लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगाजी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है। जयपुर से लगभग 250 किमी दूर स्थित सादलपुर के पास दत्तखेड़ा (ददरेवा) में गोगादेवजी का जन्म स्थान है। दत्तखेड़ा चुरू के अंतर्गत आता है। गोगादेव की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है और सैकड़ों वर्ष बीत गए, लेकिन उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर विद्यमान है। उक्त जन्म स्थान पर गुरु गोरक्षनाथ का आश्रम भी है और वहीं है गोगादेव की घोड़े पर सवार मूर्ति। भक्तजन इस स्थान पर कीर्तन करते हुए आते हैं और जन्म स्थान पर बने मंदिर पर मत्था टेककर मन्नत माँगते हैं। हनुमानगढ़ जिले के नोहर उपखंड में स्थित गोगाजी के पावन धाम गोगामेड़ी स्थित गोगाजी का समाधि स्थल जन्म स्थान से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है, जो साम्प्रदायिक सद्भाव का अनूठा प्रतीक है, जहाँ एक हिन्दू व एक मुस्लिम पुजारी खड़े रहते हैं। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा से लेकर भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा तक गोगा मेड़ी के मेले में वीर गोगाजी की समाधि तथा गोरखटीला स्थित गुरु गोरक्षनाथ के धूने पर शीश नवाकर भक्तजन मनौतियाँ माँगते हैं। ''गोगा पीर'' व ''जाहिर वीर'' के जयकारों के साथ गोगाजी तथा गुरु गोरक्षनाथ के प्रति भक्ति की अविरल धारा बहती है। भक्तजन गुरु गोरक्षनाथ के टीले पर जाकर शीश नवाते हैं, फिर गोगाजी की समाधि पर आकर ढोक देते हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग गोगा जी के मंदिर में मत्था टेक तथा छड़ियों की विशेष पूजा करते हैं। प्रदेश की लोक संस्कृति में गोगाजी के प्रति अपार आदर भाव देखते हुए कहा गया है कि ''गाँव-गाँव में खेजड़ी, गाँव-गाँव में गोगा'' वीर गोगाजी का आदर्श व्यक्तित्व भक्तजनों के लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है। विद्वानों व इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्य, धर्म, पराम व उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है। इतिहासकारों के अनुसार गोगादेव अपने बेटों सहित मेहमूद गजनबी के आाढमण के समय सतलुज के मार्ग की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। इस बार की यात्रा आपको कैसी लगी हमें जरूर बताएँ। कैसे पहुँचे वायु मार्गः-जन्मभूमि स्थल के सबमें निकटतमजयपुर का हवाई अड्डा लगभग 250 किमी पर स्थित है। रेल मार्गः-जयपुर से लगभग 250 किमी दूर स्थित सादलपुर तक ट्रेन द्वारा जाया जा सकता है। सड़क मार्गः-जयपुर देश के सभी राष्ट्रीय मार्ग से जुड़ा हुआ है।(पर्यटन-टीम)    

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